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शक्तिपात - दीक्षा

         गुरु-शिष्य परम्परा में दीक्षा का, एक विधान है। सभी प्रकार की दीक्षाओं में "शक्तिपात - दीक्षा'' सर्वोत्तम होती है। इसमें गुरु अपनी इच्छा से, चार प्रकार से शिष्य की शक्ति (कुण्डलिनी ) को चेतन करके सक्रिय करता है -(1) स्पर्श से (2) दृष्टि मात्र से (3) शब्द (मंत्र) से (4) संकल्प मात्र से भी। दीक्षा के बाद साधक को तत्काल उस परमतत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति होती है, उस दीक्षा को ''शाम्भवी दीक्षा'' कहते हैं। यह महान् दीक्षा है। बहुत ही थोड़े साधकों को ऐसी दीक्षा की शक्ति के प्रभाव को सहने की सामर्थ्य होती है। ऐसे साधकों को पातंजलि योगदर्शन में "भवप्रत्यय योगी'' की संज्ञा दी है। इस सम्बन्ध में समाधिपाद के 11 वें सूत्र में कहा है

      

      भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।( 19-1)

 विदेह और प्रकृतिलय योगियों का (उपर्युक्त योग ) भवप्रत्यय कहलाता है।''

      

     (1) स्पर्श दीक्षाः- इसमें गुरु अपनी शक्ति; शिष्य में तीन स्थानों - भूमध्य में अर्थात् आज्ञा-चक्र में, दूसरा हृदय, तीसरा मेरूदण्ड के नीचे मूलाधार पर स्पर्श करके प्रवाहित करता है।

      

     (2) मंत्र दीक्षाः- गुरु की शक्ति, शिष्य में मंत्र के द्वारा प्रवाहित होती है। 'गुरु' जिस मंत्र की दीक्षा देता है, उसे उसने लम्बे समय तक जपा हुआ होता है। मंत्र शक्ति को आत्मसात किया हुआ होता है। उस मंत्र में और गुरु में कोई अन्तर नहीं रहता । गुरु का सम्पूर्ण शरीर मंत्रमय बन जाता है, ऐसे चेतन मंत्र की, गुरु जब दीक्षा देता है, वही मुक्ति देता है।

      

     (3) दृष्टि (हक-दीक्षा ):- अर्थात् मात्र दृष्टि द्वारा दी जाने वाली दीक्षा। ऐसी दीक्षा देने वाले गुरु की दृष्टि, "अन्तर-लक्षी' होती है। यह दीक्षा वही गुरु दे सकता है, जिसने सद्गुरु से दीक्षा ली हुई हो, और जो स्वयं भी अन्तर लक्षी हो। अन्यथा यह दीक्षा देना पूर्ण रूप से असम्भव है।

      

     ऐसे महात्माओं की आँखें खुली होती है, परन्तु वास्तव में उनका ध्यान निरन्तर अन्तरात्मा की ओर ही लक्षित रहता है। ऐसे संतों की तस्वीर देखने से सही स्थिति का पता लग जाता है। ऐसे संतो में-संत सद्गुरुदेव श्री नानक देवजी महाराज, संत श्री कबीर दासजी, श्री रामकृष्ण परमहंस इत्यादि अनेक संत हमारी पवित्र भूमि में प्रकट हो चुके हैं।

      

      मेरे परम पूज्य, मोक्षदाता संत सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाईनाथजी योगी (ब्रह्मलीन) भी उपर्युक्त संतों की स्थिति में पहुँचे हुए, परम-सिद्धयोगी थे। यह सच्चाई सद्गुरुदेव का चित्र देखते ही प्रकट होती है। ऐसे परम दयालु सर्वशक्तिमान, मुक्तिदाता सद्गुरुदेव की, अहैतु की कृपा के कारण ही मेरे जैसे साधारण व्यक्ति में भी वह शक्ति प्रकट हो गई।

      

     (4) मानस (संकल्प-दीक्षा) जिसमें गुरु से दीक्षा लेने का मानस बनाने मात्र से ही दीक्षा मिल जाती हैं । ऐसे कई उदाहरण मुझे मेरे आध्यात्मिक जीवन में देखने को मिले हैं। मेरे अनेक शिष्य हैं, जिनमें कुछ तो अत्यधिक चेतन हैं। उनसे बातें करने से तथा मेरी व गुरुदेव की तस्वीर देखने मात्र से कई लोगों का ध्यान लगने लगता हैं तथा यौगिक क्रियाएँ स्वतः होने लगती हैं। परन्तु ऐसे शिष्य बहुत कम ही हैं। इस तथ्य से एकलव्य की प्रतीक-साधना सत्य प्रमाणित होती है।

      

     हमारे शास्त्रों के अनुसार जब तक मनुष्य की कुण्डलिनी जाग्रत होकर सहस्रार में नहीं पहुँचती, तब तक मोक्ष नहीं होती । पृथ्वी तत्त्व का आकाश तत्व में लय होने का नाम ही मोक्ष है, कैवल्यपद की प्राप्ति है। सिद्धयोग अर्थात् महायोग में शक्तिपात-दीक्षा द्वारा गुरु अपनी शक्ति से शिष्य की कुण्डलिनी को जाग्रत करता है। गुरु की व्याख्या करते हुए कहा गया है- "वह शिष्यों को उनके अन्तर में प्रभावी किन्तु सुप्त शक्ति (कुण्डलिनी ) को जाग्रत करता है और साधक को उस परमसत्य से साक्षात्कार-योग्य बनाता है।

''कुण्डलिनी जागरण के सम्बन्ध में कहा है -

      

 ‘‘यावत्सा निद्रिता देहे तावत जीवः पशुर्यथा।

ज्ञानम् न जायते तावत कोटियाग-विधैरपि।’’

 स्वामी विष्णु तीर्थ - शक्तिपात ।।

      

      ‘‘जब तक कुण्डलिनी शरीर में सुषुप्तावस्था में रहेगी, तब तक मनुष्य का व्यवहार पशुवत् रहेगा। और वह उस दिव्य-परमसत्ता का ज्ञान पाने में समर्थ नहीं होगा, भले ही वह हजारों प्रकार के यौगिक अभ्यास क्यों न करे।'' गुरु कृपा रूपी, शक्तिपात दीक्षा से जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है, तब क्या होता है? इस सम्बन्ध में कहा है -

      

सुप्त गुरु प्रसादेन यदा जागृति कुण्डली।

तदा सर्वानी पद्मानि भिदयन्ति ग्रन्थयो पिच॥

( ‘‘स्वात्माराम, हठयोग प्रदीपिका''- 3,2 )

      

     ‘‘जब गुरुकृपा से सुप्त कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, तब सभी चक्रों और ग्रन्थियों का (ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रूद्रग्रन्थि ) भेदन होता है। इस प्रकार साधक समाधि स्थिति, जो कि समत्त्व बोध की स्थिति है, प्राप्त कर लेता है। शक्तिपात होते ही साधक को प्रारब्ध कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ (आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम ) स्वतः ही होने लगती हैं। शिष्य में जाग्रत हुई शक्ति (कुण्डलिनी) पर गुरु का पूर्ण प्रभुत्व रहता है, जिससे वह उसके वेग को नियन्त्रित और अनुशासित करता है।

      

     कुण्डलिनी को हमारे शास्त्रों में 'जगत् जननी' कहा है। वह उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है, जो सर्वज्ञ है, सर्वत्र है, सर्वशक्तिमान है। अतः जिस साधक की कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, उसे अनिश्चितकाल तक के भूत-भविष्य एवं वर्तमान काल की प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार होने लगता है।

      

      भौतिक विज्ञान मानता है कि जो शब्द बोला जा चुका है, वह कभी नष्ट नहीं होता। अगर मानव के पास उपयुक्त यन्त्र हो तो उसे पुनः सुना जाना सम्भव है। हमारा योगदर्शन कहता है कि केवल सुना ही नहीं जा सकता है, बोलने वाले को बोलते हुए देखा-सुना जाना भी सम्भव है। जो फिल्म बन चुकी है, उसको देखने-सुनने में क्या कठिनाई है।

      

      हमारा योग-दर्शन तो स्पष्ट शब्दों में कहता है कि जो घटना नहीं घटी है, उसको भी देखा व सुना जाना संभव है। अनेक शिष्य इसको प्रमाणित करने में सक्षम हैं। हमारा पतंजलि योगदर्शन उपर्युक्त तथ्यों को प्रमाणित करता है। इसी शक्तिपात-दीक्षा के कारण ही पश्चिम को दिव्य आनन्द और अनिश्चित काल तक के भूत-भविष्य की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार होगा, बाइबल की भविष्यवाणियों का मात्र यही अर्थ है।

      

     प्रेरितों के कार्य के 2:14 से 18 में स्पष्ट शब्दों में कहा है - " पतरस उन ग्यारह के साथ खड़ा हुआ और ऊँचे शब्द से कहने लगा, कि हे यहूदियों, हे यरूशलेम के सब रहने वालों, यह जान लो और कान लगाकर मेरी बातें सुनो। जैसा तुम समझ रहे हो, ये नशे में है , ऐसा नही, क्योंकि अभी तो पहर ही दिन चढ़ा है।

      

     परन्तु यह बात है, जो योएल भविष्यवक्ता के द्वारा कही गई है ! कि परमेश्वर कहता है कि अन्त के दिनों में ऐसा होगा कि मैं अपना आत्मा सब मनुष्यों पर उड़ेलूंगा और तुम्हारे बेटे और तुम्हारी बेटियाँ भविष्यवाणी करेंगी और तुम्हारे जवान दर्शन देखेंगे और तुम्हारे पुरनिए (वृद्ध ) स्वप्न देखेंगे। वरन् मैं अपने दासों और अपनी दासियों पर भी उन दिनों में अपने आत्मा में से उड़ेलूंगा और वे भविष्यवाणी करेंगे।''

      

     इसी संदर्भ में, जिस सहायक के भेजने की भविष्यवाणी यीशु ने की है, उसी की शक्तिपात-दीक्षा के कारण यह दिव्य-आनन्द और ज्ञान प्राप्त होगा। इस सम्बन्ध में प्रेरितों के कार्य 2:33 में कहा है - इस प्रकार परमेश्वर के दाहिने हाथ से सर्वोच्च पद पाकर और पिता से वह पवित्र आत्मा प्राप्त करके जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी, उसने यह उँडेल दिया है, जो तुम देखते और सुनते हो।'

      

      इस शक्तिपात-दीक्षा का वर्णन अनेक दार्शनिक ग्रन्थों में मिलता है। जैसा कि स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने कहा है, " यह ज्ञान मात्र हमारे दर्शन की ही देन है।" परन्तु कलियुग के गुणधर्म के कारण यह दिव्य विज्ञान इस समय हमारी धरती पर से लोप प्रायः हो चुका है। शक्तिपात-दीक्षा के बाद, मेरे साधकों की कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत हो जाती है। इससे उन्हें विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ जैसेः- आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम स्वतः होने लगते हैं। वह शक्ति (कुण्डलिनी)साधक का शरीर, प्राण, मन और बुद्धि अपने स्वायत( अधीन ) कर लेती है।

      

      इस प्रकार साधक को जो विभिन्न प्रकार के आसन्न, बन्ध, मुद्राएँ और प्राणायाम होते हैं, उनमें साधक का स्वयं का प्रयास कुछ भी नहीं रहता है। न तो वह उन्हें करने की स्थिति में होता है और न ही रोकने की। भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को इस दिव्य विज्ञान के कारण, अनेक समस्याओं का समाधान करने में भारी सफलता मिलेगी। कुण्डलिनी (चित्ति) उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है। अतः उसमें ज्ञान की ''पराकाष्ठा'' है। वह अजर-अमर है तथा सर्वज्ञ एवं सर्वत्र है। अतः उसके जाग्रत होने पर साधक को भूत, भविष्य एवं वर्तमान की पूर्ण जानकारी होने में कोई आश्चर्य नहीं है। ईश्वर को सच्चिदानन्द धन (सत् चित् व आनन्द) कहते हैं।

      

      अतः कुण्डलिनी के जाग्रत होने पर साधक को इन्द्रियातीत दिव्य अक्षय आनन्द की निरन्तर प्रत्यक्षानुभूति होने लगती है। इस दिव्य आनन्द के सामने सभी प्रकार के नशों से घृणा हो जाती है और बिना किसी प्रकार के कष्ट के, उनसे सहज रूप में पूर्ण मुक्ति मिल जाती है। मेरे साधकों में बहुत लोग ऐसे हैं जो शराब, अफीम, भांग, गांजा आदि के नशों से बुरी तरह ग्रसित थे। इस दिव्य आनन्द के कारण सभी साधक उन सभी प्रकार के नशों से, बिना किसी प्रक कष्ट या मानसिक कष्ट के पूर्ण रूप से मुक्त हो चुके हैं।

      

      यही नहीं इस दिव्य आनन्द के कारण मानसिक तनाव पूर्ण रूप से शान्त हो जाता है तथा उससे सम्बन्धित सभी रोग जैसे उन्माद, रक्तचाप, अनिद्रा आदि बिना दवा के स्वतः पूर्णरूप से खत्म हो जाते हैं। विद्युत उपचार से ठीक न होने वाले कई रोगी पूर्ण रूप से रोग मुक्त हो चुके हैं। दो ऐसे रोगी आये जो इन्सुलीन चिकित्सा से भी ठीक नहीं हो सके थे, इस शक्तिपात-दीक्षा से मिलने वाली आनन्द रूपी शान्ति के कारण पूर्णरूप से स्वस्थ हो चुके हैं। हमारे दर्शन में योगदर्शन के अतिरिक्त भी इस दिव्य आनन्द का वर्णन मिलता है। गीता के 5 वें अध्याय के 21 वें तथा 6 वें अध्याय के 15वें 21वें 27 वें तथा 28 वें श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने जिस बारीकी से इस दिव्य आनन्द की व्याख्या की है, अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।

      

बाह्मस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।

स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥5:21॥

      

     ‘‘बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अन्त:करण वाला पुरूष अन्तःकरण में जो भगवत्-ध्यान जनित आनन्द है, उसको प्राप्त होता है (और) वह पुरूष सच्चिदानन्दधन परब्रह्म परमात्मारूप योग में एकीभाव से स्थित हुआ, अक्षय आनन्द को अनुभव करता है।

      

युजन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।

शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।6:15॥

      

      ‘‘इस प्रकार आत्मा को निरन्तर (परमेश्वर के स्वरूप में ) लगाता हुआ स्वाधीन मनवाला योगी मेरे में स्थित रूप परमानन्द पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है।''

      

सुखमात्यन्तिकं यत्तद बुद्धि ग्राह्यमतीन्दियम।

वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ।। 6:21।।गीता ‘‘

      

     ‘‘इन्द्रियों से अतीत केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ यह योगी भगवत स्वरूप से चलायमान नहीं होता है।''

      

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।

उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्।।6:27॥

      

     ‘‘क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शान्त है (और ) जो पाप से रहित है (और ) जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दनधन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को अति उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।''

      

युजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।

सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श मत्यन्तं सुखामश्नुते ॥ 6:28।। "

      

     ‘‘पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को परमात्मा में लगाता हुआ, सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनन्द को अनुभव करता हैं।''

      

      वैदिक मनोवैज्ञानिक ( अध्यात्म विज्ञान ) के अनुसार मनुष्य का शरीर सात प्रकार के कोशों (शैलों) से संघटित हैं, जिनके खोलों (कोशों) में आत्मा अन्तर्निहित है। वे हैं- (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञान मय कोश (5)आनन्दमय कोश(6) चितमय कोश (7) सतमय कोश। हमारे विकास की वर्तमान अवस्था में साधारण मानव ने अपने नित्य व्यवहार के लिए पहले तीन कोशों का ही विकास किया है।

      

     कुछ मनुष्य सामर्थ्यपूर्वक विज्ञानमय कोश का प्रयोग करने में भी सक्षम है । क्योंकि इस समय विज्ञान अपने निज धाम से संचालित न होकर, बुद्धिप्रधान मन में स्थित होकर कार्य करता है। यही कारण है, विज्ञान सृजन के स्थान पर विध्वंश का कार्य अधिक कर रहा है। योगी इससे भी परे साक्षात् विज्ञान ( विज्ञानमय कोश के निजधाम ) तक जा पहुँचता है। जब विज्ञान अपने निजधाम में संचालित होकर कार्य करेगा, तब इसका सम्पूर्ण उपयोग मात्र सृजन में ही होगा। इसीलिए महर्षि श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है ।

      

     ‘‘भारत, जीवन के सामने योग का आदर्श रखने के लिए उठ रहा है। वह योग के द्वारा ही सच्ची स्वाधीनता, एकता और महानता प्राप्त करेगा और योग के द्वारा ही उसका रक्षण करेगा।''

      

      याज्ञवल्क्य जैसे महानतम ऋषि तो साक्षात् आनन्द तक पहुँच चुके हैं। परन्तु अन्तिम दो कोश अभी तक प्राप्त नहीं हो सके हैं। सिद्धयोग अर्थात् महायोग जो गुरु कृपारूपी शक्पिात दीक्षा से सिद्ध होता है, उसके साधक सातों कोशों का ज्ञान प्राप्त करने में सफल हुए हैं।

      

     ऐसे अनेक उदाहरण हमारे शास्त्रों में वर्णित हैं। पतंजलि योग दर्शन तो केवल 195 सूत्रों में कैवल्य पद पर पहुँचने की क्रियात्मक विधि बताता है।

      

     ‘‘मनुष्य योनि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।'' सभी का मत है कि मानव का सृजन उसके सृजनहार की प्रतिमूर्ति के रूप में हुआ है। अतः मनुष्य अपना क्रमिक विकास करते हुए अपने सृजनहार के 'तद्प' बन सकता है। भगवान् श्रीकृष्ण ने मनुष्य की व्याख्या करते हुए गीता के 13 वें अध्याय के 22 वें श्लोक में स्पष्ट शब्दों में कहा है

      

उपदष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहे स्मिन्युरूषः परः ॥

      

     ‘‘पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ( त्रिगुणातीत ) है। (केवल ) साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता एवं सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीव रूप से भोक्ता तथा ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दधन होने से ‘‘परमात्मा'' ऐसा कहा गया है।''

      

     इस इन्द्रियातीत आनन्द को संतों ने "हरि नाम की खुमारी'' की संज्ञा दी है। संत सद्गुरु श्री नानकदेवजी ने कहा है

      

भांग धतुरा नानका, उतर जाय प्रभात।

नामखुमारी "नानका चढ़ी रहे दिन रात ।।"

      

     संत कबीर दास जी ने कहा है -

      

नाम-अमल' उतरे न भाई।

और अमल छिन्न-छिन्न चढ़ि उतरै।

नाम -अमल' दिन बढ़े सवायो।।''

      

     बाइबल भी स्पष्ट कहती है- ''यह एक आन्तरिक आनन्द है, जो सभी सच्चे विश्वासियों के हृदय में आता है। यह आनन्द हृदय में बना रहता है, सांसारिक आनन्द से तब तक भरता है, जब तक उमड़ न जाय। प्रभु का आनन्द जो हमारे हृदयों में बहता है, हमारे हृदयों से उमड़ कर दूसरों तक बह सकता है।'' यह आनन्द ही शान्ति स्थापित करेगा।

      -समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग