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धर्म क्या है ?

      

       इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्य केवल प्रदर्शन, शब्द जाल, तर्कशास्त्र और अन्ध विश्वास के सहारे लोगों को अध्यात्मवाद सिखा रहे हैं। शब्द जाल और तर्क शास्त्र के सहारे धर्म की व्याख्या, इस प्रकार तोड़-मरोड़ करके कर रहे हैं कि धर्म एक प्राणहीन मुर्दा लाश (शव) मात्र रह गया है। निष्प्राण धर्म कल्याण किस प्रकार कर सकता है?

      

       सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने धर्म को एक व्यवसाय मात्र बना लिया है। धर्म के सहारे आर्थिक तथा राजनैतिक लाभ उठाया जा रहा है। ऐसा लग रहा है, मानो संसार के सभी धर्माचार्यों को पक्का विश्वास हो गया है कि ईश्वर नाम की कोई शक्ति संसार में है ही नहीं। यह केवल काल्पनिक धारणा लोगों में फैलाई हुई है। इस झूठी धारणा के सहारे जितना चाहो प्राणियों का शोषण कर सकते हो। ऐसा लगता है, कुए में ही भांग पड़ गई है। सभी धर्म एक ही रास्ते पर चलने लगे हैं। | सभी धर्माचार्य अगले जन्म में मिलने का झूठा झांसा देकर संसार को लूट रहे हैं। धन के आधार पर पाप माफी का प्रमाण पत्र तक देने लगे हैं। इससे घोर अपराध क्या होगा? अगर ऐसी विषय स्थिति में भी भगवान् अवतार नहीं लेते हैं तो समझ लेना चाहिए कि प्रलय का समय बहुत सन्निकट है। आज संसार में धर्म के नाम पर लूट अन्याय और अत्याचार जितना पनप रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। हमारा इतिहास बताता है कि जब-जब ही ऐसी स्थिति पैदा हुई है, भगवान् ने अवतार लिया है।

      

        धर्म की व्याख्या करते समय हमारे ऋषियों ने स्पष्ट कहा है कि धर्म प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। प्रदर्शन, शब्द, जाल, तर्क शास्त्र और अन्धविश्वास से इसका दूर का भी सम्बन्ध नहीं हैं। पिछली सदी में स्वामी विवेकानन्द जी संसार में एक आध्यात्मिक संत के रूप में प्रकट हुए। अमेरिका में उन्होंने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा था "विभिन्न मत मतान्तरों या सिद्धान्तों पर विश्वास करने के प्रयत्न हिन्दू धर्म में नहीं है, वरन् हिन्दू धर्म तो प्रत्यक्षानुभूति या साक्षात्कार का धर्म है। केवल विश्वास का नाम हिन्दू धर्म नहीं है, हिन्दू धर्म का मूल मंत्र तो 'मैं' आत्मा हूँ यह विश्वास होना और 'तदूप' बन जाना है।"

      

       इसी संदर्भ में स्वामी जी ने एक कदम और आगे बढ़ कर कह डाला किः- "अनुभूति-अनुभूति की यह महती शक्तिमयी वाणी भारत के ही आध्यात्मिक गगन मण्डल से आविर्भूत हुई है। एक मात्र हमारा वैदिक धर्म ही है, जो बारम्बार कहता है, ईश्वर के दर्शन करने होंगे, उसकी प्रत्यक्षानुभूति करनी होगी, तभी मुक्ति संभव है। तोते की तरह कुछ शब्द रट लेने से काम चल ही नहीं सकता।'' स्वामी जी ने कहा है धर्म में प्रत्यक्षानुभूति न हो तो वह वास्तव में धर्म कहलाने योग्य है ही नहीं। क्या इस समय संसार के किसी भी धर्म का धर्माचार्य उपर्युक्त बात दोहराने की स्थिति में है ? इस समय तो ईश्वर और धर्म की अपनी-अपनी तर्क बुद्धि के अनुसार अजीब-अजीब व्याख्या करके धर्माचार्य संसार के लोगों को भ्रमित कर रहे हैं।

      

       प्रत्यक्षानुभूति या साक्षात्कार की बात करने तक का साहस किसी में दिखाई नहीं देता। इस समय संसार में मनुष्य जाति में एक ऐसा विशेष वर्ग पैदा हो गया है जो ईश्वर तथा धर्म का, एक मात्र ठेकेदार अपने आप को घोषित कर बैठा है। अगर आपको आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करना है तो उसके प्रमाण पत्र के बिना काम नहीं चलेगा। अपने प्रमाण पत्र की वह भरपूर कीमत लेकर आपको जिस रास्ते पर चलने का आदेश देगा, उसी पर आपको चलना होगा। जो मान्यताएँ उस वर्ग विशेष ने बना रखी हैं, वही धर्म सम्मत है, बाकी सब रास्ते नरक में ले जाने वाले अधर्म के हैं।

      

        इस समय संसार में धर्म के नाम पर भीख से लेकर हत्या तक की छूट है। कैसा भयंकर रूप बना डाला; इस युग के मानव ने, धर्म का? इस युग का मानव धन के लिए धर्म की ओट में घृणित से घृणित कार्य करने से भी नहीं झिझकता। ऐसी स्थिति में संसार में शान्ति, प्रेम, दया और सद्भाव कैसे संभव है?

- समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग