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जाति पाति पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।

           

      इस समय संसार के सभी धर्मों में एक वर्ग विशेष अपने आप को धर्म का ठेकेदार घोषित कर बैठा है। सभी धर्मों में ऐसी व्यवस्था बना रखी है कि उनकी आज्ञा के बिना ईश्वर से मिलना असम्भव है। सभी धार्मिक ग्रन्थ इस मानवीय व्यवस्था का खुला विरोध करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के नवें अध्याय में स्पष्ट कहा है :-

      

       अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

       साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥30॥

      

     यदि अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरे को भजता है, वह साधु ही मानने योग्य है, यथार्थ निश्चय वाला है।

      

       क्षिप्नं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।।

       कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥31॥

      

     (वह) शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है। (और) सदा रहने वाली परमशान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! निश्चय -पूर्वक सत्य जान, मेरा भक्त नष्ट नहीं होता है।

      

       मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य,ये पि स्युः पापयोनयः।

       स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्ते पियान्ति परां गतिम्॥32॥

      

     क्योंकि हे अर्जुन स्त्री, वैश्य (और ) शुद्रादिक तथा पापयोनिवाले भी जो कोई होवे वे भी मेरे शरणगत होकर परम गति को प्राप्त होते हैं।

      

       किं पुनर्बाह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।

       अनित्यमसुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥33॥

      

     फिर क्या कहना पुण्य शील ब्राह्मणजन तथा राजर्षि भक्तजन मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस लिए सुख रहित क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर।

      

     गीता के उपर्युक्त श्लोक स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर का कोई भी ठेकेदार नहीं है। हर प्राणी के लिए प्रभु के द्वार खुले हैं। परन्तु फिर भी युग के गुणधर्म के कारण संसार में इतना अन्धकार फैल गया है कि किसी को सही रास्ता नजर ही नहीं आता। इस युग में लोग भ्रमित करने वाले झूठा स्वांग रचकर प्रदर्शन करने वाले ढोंगी लोगों की तरफ अधिक आकर्षित होते हैं। अपने विवेक से कोई चलने की स्थिति में नहीं है। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है :-

      

       सामो हं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यो स्ति न प्रियः।

       ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषुचाप्यहम्॥26॥

      

     मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न मेरा (कोई) अप्रिय है, न प्रिय है, परन्तु जो मेरे को प्रेम से भजते हैं, वे मेरे में और मैं भी उनमें (हूँ)।

      

     इतना होने पर भी इस समय के धर्म गुरु स्वार्थवश, इसी पवित्र ग्रन्थ की व्याख्या तोड़-मरोड़ कर करते हैं कि लोग भ्रमित हो जाते हैं। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, त्याग-तपस्या, दान-पुण्य, स्वर्ग-नरक आदि की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि लोग भयभीत होकर, अपनी सहज बुद्धि भी खो बैठते हैं। इस प्रकार संसार के भोले भाले लोगों को धर्म की आड़ में ठगने का व्यापार सर्वत्र फैला हुआ है। इस सम्बन्ध में स्वामी श्री विवेकाननद जी ने इन तथाकथित धर्म गुरुओं को फटकारते हुए कहा था :-

      

     तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है, रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हँडिया बर्तन तुम्हारे शास्त्र। स्वामी जी ने संसार के धर्म गुरुओं का सही चित्र प्रस्तुत किया है। इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्यों ने धर्म को पेट से जोड़ रखा है। पेट के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं।

      

     ज्यों-ज्यों इनका विरोध बढता गया, इन्होंने भी अपने संगठन बनाकर अपनी सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध कर लिया। एक प्रकार से दूसरा समाज बराबर संगठित करके, हर मुकाबले की तैयारी कर ली। इस समय धर्म, भय, लालच, प्रलोभन और धोखे से सिखाया जाता है। प्रेम, सद्भाव, श्रद्धा, विश्वास नाम की कोई वस्तु; इस समय नहीं मिलेगी। केवल भ्रमित और भयभीत करके त्याग तपस्या, दान-पुण्य, स्वर्ग नर्क आदि की काल्पनिक व्याख्या करके जितना अधिक ठगा जा सके, निरन्तर यही प्रयास चल रहा है। यह स्थिति अब चरम सीमा पर पहुँच चुकी है।

      

     अब संसार के लोग आगे ठगे जाने के लिए तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि सभी धर्म के मठाधीश इस समय अन्तिम संघर्ष में लगे हुए हैं। परन्तु परिवर्तन संसार का नियम है।

      

     इससे संसार की कोई वस्तु बच नहीं सकती। अतः इस धार्मिक व्यवस्था का भी अन्त अधिक दूर नहीं है।

- समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग