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भारत में आध्यात्मिक जागृति

      

      इस समय भारत में आध्यात्मिक जगत् में पूर्ण रूप से अन्धकार है। जब तक भारत का आम नागरिक अपनी इस कमजोरी को दिल से स्वीकार करके दूर करने का सामूहिक प्रयास प्रारम्भ नहीं करता है, यह भयंकर अन्धकार मिटने वाला नहीं है। हम भारतीयों में यह कमी है कि हमारी कमजोरी को स्वीकार नहीं करते। उसे छिपाने के लिए तर्क शास्त्र के सहारे अनेक झूठे तर्क देकर झूठ को सत्य प्रमाणित करने का प्रयास निरन्तर करते रहते हैं। इस प्रकार हमने सच्चाई के स्थान पर झूठ के अम्बार लगा लिए हैं।

      

     हम आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण रूप से खोखले हो चुके हैं। जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करते है, हमारी स्थिति में कोई भी परिवर्तन आने वाला नहीं है।

      

     भारत के अन्धकार के बारे में महर्षि अरविन्द ने कहा है :- "यह कई कारणों से है। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के आने से पहले ही तामसिक प्रवृत्तियों और छिन्न-भिन्न करने वाली शक्तियों का जोर हो चला था। उनके आने पर मानो सारा तामस् ठोस बनकर यहाँ जम गया है। कुछ वास्तविक काम होने से पहले यह जरूरी है कि यहाँ जागृति आये। तिलक, दास, विवेकानन्द इनमें कोई भी साधारण आदमी न थे, लेकिन इनके होते हुए भी तामस् बना हुआ है। इस सम्बन्ध में 'श्री माँ' ने भी कहा है :- "भारत के अन्दर सारे संसार की समस्याएँ केन्द्रित हो गई हैं, और उनके हल होने पर सारे संसार का भार हल्का हो जायेगा।'' उपर्युक्त तथ्यों में जब तक आप भारतीय, खुले दिल से स्वीकार करके, सच्चाई का मार्ग नहीं खोजोगे, अन्धकार मिटने वाला नहीं हैं।

      

     जहाँ सच्चाई होगी, वहीं ईश्वर की शक्ति प्रत्यक्ष रूप से कार्य करेगी। ईश्वर कृपा से, मानव; मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और सुख शान्ति का जीवन बिताता है। हमारे देश की दरिद्रता, गरीबी, हर वस्तु का अभाव, हिंसा, घृणा, द्वेष, क्रूरता आदि स्पष्ट दर्शाती है कि यहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण रूप से अन्धकार है। केवल भ्रमित करने वाले उपदेश तरह-तरह के स्वांग और प्रदर्शन शब्द जाल और तर्क शास्त्र से समस्या का समाधान होता तो अब तक चेतना कभी की आ गई होती।

      

     परन्तु इन सब के चलते अन्धकार दिनों दिन ठोस होता जा रहा है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा। इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्द जी ने अमेरिका से जो पत्र लिख कर भारत भेजे, उनसे स्थिति बहुत स्पष्ट हो जाती है। स्वामी जी ने अगस्त 1895 में अमेरिका से श्री आलासिंग पेरूमल को पत्र लिखा वह इस प्रकार है :- “वास्तव में भारत ने मेरे लिए जो किया है, उससे कहीं अधिक मैंने भारत के लिए किया है। वहाँ तो मुझे रोटी के एक टुकड़े के लिये डलिया भर गालियाँ मिलती हैं। मैं कहीं भी क्यों न जाऊँ, प्रभु मेरे लिए काम करने वालों के, दल के दल भेज देता है। वे लोग भारतीय शिष्यों की तरह नहीं है, अपने गुरु के लिए प्राणों तक की बाजी लगा देने को प्रस्तुत हैं।

      

      पाश्चात्य देशों में प्रभु क्या करना चाहते हैं? यह तुम हिन्दुओं को कुछ ही वर्षों में देखने को मिलेगा। तुम लोग प्राचीन काल के यहूदियों जैसे हो और तुम्हारी स्थिति नांद में लेटे हुए कुत्ते की तरह है, जो न खुद खाता है। और न दूसरों को ही खाने देना चाहता है। तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है। रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हँडिया बर्तन तुम्हारा शास्त्र। अपनी तरह असंख्य सन्तानोत्पादन में ही तुम्हारी शक्ति का परिचय मिलता है।'' उपर्युक्त तस्वीर हमारे अध्यात्मवाद को स्पष्ट करती है, जिसके दम्भ पर हम फूले जा रहे हैं।

      

      इसी सम्बन्ध में स्वामी जी ने एक पत्र 01 सितम्बर 1895 को पेरिस से लिखा था। उस पत्र में हमारे अध्यात्मवाद की असली तस्वीर नजर आती है। स्वामी जी ने लिखा है :- "मैं जैसा भारत का हूँ, वैसे ही समग्र जगत् का भी हूँ।" इस विषय को लेकर मनमानी बातें बनाना निरर्थक है। मुझसे जहाँ तक हो सकता था, मैंने तुम लोगों की सहायता की है, अब तुम्हें स्वयं ही अपनी सहायता करनी चाहिए।

      

     ऐसा कौन सा देश है, जो कि मुझ पर विशेष अधिकार रखता है? क्या मैं किसी जाति के द्वारा खरीदा हुआ दास हूँ? अविश्वासी नास्तिकों, तुम लोग ऐसी व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बातें मत बनाओ। मैंने कठोर परिश्रम किया है। और मुझे जो कुछ धन मिला है, उसे मैं कलकत्ते और मद्रास भेजता रहा हूँ। यह सब करने के बाद अब मुझे उन लोगों के मूखतापूर्ण निर्देशानुसार चलना होगा? क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? मैं उन लोगों का किस बात का ऋणी हूँ? क्या मैं उनकी प्रशंसा की कोई परवाह करता हूँ या उनकी निन्दा से डरता हूँ। बच्चे, मैं एक ऐसे विचित्र स्वभाव का व्यक्ति हूँ कि मुझे पहचानना तुम लोगों के लिए भी अभी संभव नहीं है। तुम अपने कार्य करते रहो। नहीं कर सकते तो चुपचाप बैठ जाओ। अपनी मूर्खता के बल पर मुझ से अपनी इच्छानुसार कार्य कराने की चेष्टा न करो।

      

     मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं, जीवन भर मैं ही दूसरों की सहायता करता रहा हूँ। श्री रामकृष्ण परमहँस के कार्यों में सहायता प्रदान करने के लिए जहाँ के निवासियों में दो-चार रुपये भी एकत्र करने की शक्ति नहीं है, वे लोग लगातार व्यर्थ की बातें बना रहे हैं और उस व्यक्ति पर अपना हुक्म चलाना चाहते हैं, जिसके लिए उन्होंने कभी भी कुछ नहीं किया, प्रत्युत जिसने उन लोगों के लिए जहाँ तक हो सकता था, सब कुछ किया।

      

     जगत् ऐसा ही अकृतज्ञ है। क्या तुम यह कहना चाहते हो कि ऐसे जातिभेद जर्जरित कुसंस्कारयुक्त दया रहित, कपटी, नास्तिक कायरों में से जो केवल शिक्षित हिन्दुओं में ही पाये जा सकते हैं। एक बनकर जीने मरने के लिए, मैं पैदा हुआ हूँ। मैं कायरता को घृणा की दृष्टि से देखता हूँ। कायर तथा राजनीतिक मूर्खतापूर्ण बकवासों के साथ, मैं अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। किसी प्रकार की राजनीति में मुझे विश्वास नहीं है। "ईश्वर तथा सत्य ही जगत् में एक मात्र राजनीति है, बाकी सब कूड़ा-करकट है।'' मुझे, उस परमसत्ता ने आध्यात्मिक जगत् की जो प्रत्यक्षानुभूति करवाई है, वह उपर्युक्त तथ्यों से सत्यापित होती है। जब तक हम झूठे दम्भ को त्यागकर उस परमसत्ता से वास्वतिक सम्बन्ध स्थापित नहीं करेंगे, काम नही बनेगा। झूठ के पैर नहीं होते। आखिर हम देशवासियों को कितने दिन धोखा दे सकेंगे? काल की गति ने किसी को माफ नहीं किया, बड़ी से बड़ी तामसिक सत्ता भी उसके सामने नहीं टिक सकी। भगवान् श्री कृष्ण ने कहा हैः-

      

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो,

लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि तां न भविष्यन्ति सर्वे,

येऽवस्थितः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

      

     वही परमसत्ता संसार में अवतरित हो चुकी है। जिसकी भविष्यवाणी संसार के बहुत से संत कर चुके हैं। अतः अब तामसिकता का अन्त होकर, युग परिवर्तन में अधिक देर नहीं है।

- समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग