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सिद्धियाँ

                 

     जब साधक योग साधना में आगे बढ़ता है तो उसको आराधना काल में अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। सिद्धयोगियों ने इन सिद्धियाँ में नहीं फंसने की बात कही है। सद्गुरुदेव ने अपनी कर कमल की लेखनी से लिखकर यह पाठ्य सामग्री 'स्पिरिचुअल-साइंस' पुस्तक में छापने का आदेश दिया था।

      

     शास्त्रिय महर्षियों ने मोटे तौर से तीन प्रकार की सिद्धियाँ बताई हैं। हम उन तीनों को तमोगुण-सिद्धि, रजोगुण-सिद्धि एवं सतोगुण-सिद्धि के नाम से समझ सकते हैं:-

      

      1. मैली (तमोगुणी) वह है, जो अशुद्धि व्रत, मंत्र या द्रव द्वारा प्राप्त की जाती है। इस मैली-सिद्धि जानने वालों को यदि स्नान करवा कर शुचि और पवित्र बना दिया जाय तो वह अपनी सिद्धि नहीं कर सकता। जब वह हाथ या पैर मैला करता है, तभी सिद्धि का प्रदर्शन कर सकता है। यह सिद्धि दूसरों का अनिष्ट करती है, किसी का मंगल नहीं कर सकती।

      

     2. मंत्र-सिद्धि वह है,जो देश और काल की अपेक्षा रखकर किसी एक देवता को लक्ष्य करके मंत्रजप से प्राप्त की जाती है। यह सिद्धि जिसको प्राप्त हो, वह देवता का स्मरण या मंत्रजप करके हाथ में फल, मिठाई एवं सोने-चाँदी के आभूषण इत्यादि लाता है या कोई वस्तु एक स्थल से दूसरे स्थान पर संक्रमित करता है। तथा और भी कई प्रकार के चमत्कार दिखा सकता है। इस प्रकार की सिद्धियाँ दिखाने से लोग आकर्षित होते हैं। ऐसी कृत्रिम रीति से मिली हुई क्षुद्र सिद्धियाँ ज्यादा समय तक नहीं टिकती।

      

     3. अष्टांगयोग करने से जो संयमसिद्धि प्राप्त होती है, वह योग सिद्धि है। यह सत्य और शास्त्रिय सिद्धि है।

      

     4. चौथी सिद्धि त्रिगुणातीत उस परमसत्ता की है, जिसे महासिद्धियाँ त्रिगुणातीत सिद्धि कहते हैं। यह वह सिद्धि है, जो हमेशा ईश्वर के आदेश से ही कार्य करती है। उस परम सिद्धि के अधीन आठ प्रकार की शक्तियाँ होती हैं, जिनका वर्णन पातंजलि योगदर्शन के विभूतिपाद के 45 वें सूत्र में निम्न प्रकार से किया है:-

      

     "ततोणिमादिप्रादुर्भाव:कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च॥ 3:45॥

      

     डस (भूतजय ) से अणिमादि आठ सिद्धियों का प्रकट होना कायसम्पत्त की प्राप्ति और उन भूतों के धर्मों से बाधा न होना (ये तीनों होते हैं)

      

     अणिमाः- अणु के समान सूक्ष्म रूप धारण कर लेना।

      

      लघिमाः- शरीर को हल्का ( भारहीन ) कर लेना।

      

     महिमाः- शरीर को बड़ा( विशालकाय ) कर लेना।

      

      गरिमाः- शरीर को भारी कर लेना।

      

      प्राप्तिः- जिस किसी इच्छित भौतिक पदार्थको संकल्पमात्र से ही प्राप्त कर लेना।

      

      प्राकाम्यः- बिना रुकावट भौतिक पदार्थ संबंधी इच्छा की पूर्ति अनायाश हो जाना।

      

      वशित्वः- पाँचों भूतों का और तंजंन्य पदार्थों का वश में होना।

      

     ईशित्वः- उन भूत और भौतिक पदार्थों का नाना रूपों में उत्पन्न करने और उन पर शासन करने की सामर्थ्य प्राप्त करना।

      

     - समर्थ सदगुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग