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आध्यात्मिक सत्संग

                 

     इस युग में आध्यात्मिक सत्संग का सही अर्थ प्रायः लुप्त हो चला है। भजन, कीर्तन, कथा, उपदेश आदि सत्संग के कई प्रकार, इस समय संसार में प्रचलित हैं। सत्संग का सीधा साधा अर्थ है, सत्य का साथ करना। केवल ईश्वर ही सत्य है बाकी दृश्य जगत् सारा नाशवान है। अतः जिसके संग के कारण उस परमतत्त्व परब्रह्म परमात्मा, सच्चिदानन्दघन की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार हो जाय, वही सच्चा सत्संग है।इस समय संसार से ईश्वर तत्त्व प्रायः पूर्ण रूप से लोप हो गया है।

      

     इस समय उस तत्त्व की प्रत्यक्षानुभूति मात्र कल्पना का विषय रह गया है। उस परमतत्त्व के लोप होने के सम्बन्ध में समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी महाराज कहते हैं:-

      

‘‘तिन्ही लोक जेथून निर्माण जालेतया देवरायासि कोणी न बोले।

जगी थोरलादेव तो चोरलासे गुरुवीण तो सर्वथाही न दीप्ते।।’’

      

     ‘‘तीनों लोक-भूलोक, द्युलोक, पाताल लोक जहाँ से उत्पन्न हुए उस सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म देवाधिदेव श्रीराम को कोई नहीं कहता। जग में, सर्वोत्तम देव चुराया गया है। उसके चोरी हो जाने के बाद, वह दिखाई नहीं दे रहा है। उस सर्व देवाधिदेव की चोरी की तो गई है किन्तु सदगुरुरूपी गुप्तचर की सहायता के बिना वह नहीं दिख सकेगा।’’ परन्तु इस युग में संत सद्गुरु मिलना बहुत ही कठिन है। इस सम्बन्ध में समर्थ गुरुदेव कहते हैं :-

      

गुरु पाहता पाहतां लक्ष कोटी।बहुसाल मंत्रावली शक्ति मोठी।

मनी कामना चेटके धातमाता।जनीव्यर्थरे तो नव्हे मुक्तिदाता॥

      

      "गुरुओं को देखते-देखते तो लाखों-करोड़ो गुरु मिलेंगे। वे बहुत वर्षों तक मंत्र द्वारा चतुराई से अपने भीतर जादूगरी की बड़ी शक्ति द्वारा कामना-पूर्ति कर लोगों को अपने चंगुल में चिन्तामणि सदृश अपनी मन्त्र शक्ति के प्रभाव से ही हँसाते फिरते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं। वे मोक्षदाता-सद्गुरु पद पाने के अधिकारी नहीं होते।" आगे ऐसे गुरुओं के लिए समर्थ गुरु कहते हैं।:-

      

नव्हे चेटकीचालकूद्रव्यभोंदू।नव्हे निंदकू मत्सरू भक्तिमंदु। 

नव्हे उन्मतू वेसनी संगबाधू।जगी ज्ञानियो तोचि साधु अगाधू॥

      

     जो जादू करने वाला होता है, लोगों के सम्मुख दीनता दिखाकर आह्लाद उत्पन्न करनेवाला या मिथ्या प्रशंसा करनेवाला होता है। तथा अपने साधुत्व का प्रदर्शन कर लोगों से पैसा लूटनेवाला द्रव्यलोभी होता है, वह सद्गुरु पद का अधिकारी नहीं होता।"

      

      "वह किसी की निन्दा नहीं करता किसी से मत्सर्य नहीं रखता, उन्मत्त नहीं होता, व्यसनी नहीं होता तथा बुरी संगति में नहीं रहता जो बुरी संगतियों में बाधा डालनेवाला ज्ञान सम्पन्न होता है, वही अगाधाज्ञानी व्यक्ति साधु है। ऐसा जानना चाहिए।

      

नव्हे वाडगीचाहुटी काम पोटी। क्रियेवीण वाचालत तेचि मोटी।

मुखे बोलिल्यासारिखें चालताहे। मना सद्गुरु तोचि शोधूनि पाहे॥

      

     वह व्यक्ति चुगलखोर नहीं होता। उसके अन्तरंग में काम भावना नहीं होती। वह मुख से बोले गये शब्दों का वैसा ही आचरण करने में सभ्य होता है। हे मन इन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही सद्गुरु समझना चाहिए।

      

जन भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी। कृपालू मनस्वी क्षमावंत योगी।

प्रभूदक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे। त्याचेनि योगे समाधान बाणे॥

      

      वह सद्गुरु पद का अधिकारी भक्त होता है और विवेक वैराग्य सम्पन्न, कृपालू मनस्वी क्षमाशील, योगी, समर्थ, अत्यन्त सावधान, व्युत्पन्न (प्रत्युत्पन्नमतिवाला) चातुर्यसम्पन्न तथा संगति करने पर समाधान की प्राप्ति कराकर समाधानी बनाने वाला होता है।

      

नव्हें तेंचि जाले नसे तेंचि आल।कलों लागले सज्जनाचेनि बोल॥

अनिर्वाच्य ते वाच्य वाचे वदावें। मना संत आनंत शोधीत जावें।

      

      जो पहले नहीं था, वह हो गया - स्वरूप का बोध पहले नहीं था, वह हो गया। जो नहीं आता था, वह समाधान आ गया। ब्रह्मज्ञान से पूर्ण स्वरूपानन्द का भोग करने से समाधान चित्त में वास करने लगता है। गहन वेदान्त वाक्यों का बोध जो स्वरूप का संकेत दिया करता था, वह पहले नहीं समझता था। वह बोध महावाक्य (तत्त्वमसि ) आदि का अर्थ सद्गुरुदेव के कृपा वचनों से सहज ही आत्मसात् हो जाने से समझ में आने लगा।

      

      जो ब्रह्म निर्गुण निराकार और वाणी से परे अनिर्वचनीय था, वही वाणी से कहने योग्य और वाच्य हो गया। यह सदगुरुदेव की कृपा है। कि वही ब्रह्म अब मेरे कथन का विषय हो गया है। हे मन !नित्य अनन्त ब्रह्म को सत्संग

      

     उपर्युक्त से स्पष्ट होता है कि ऐसे संत सदगुरु की सत्संग को ही सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक सत्संग कहा जा सकता है।

      

     अगर आध्यात्मिक सत्संग प्रत्यक्ष परिणाम न दे तो उसे सत्संग नहीं कहा जा सकता। केवल विश्वास से काम नहीं चल सकता। जिस प्रकार गुड़ खाते ही मुँह में मिठास पैदा हो जाता है, ठीक वैसा ही परिणाम सत्संग का होना चाहिए। इसके विपरीत सभी कर्मकाण्ड और प्रदर्शन हैं। समर्थ गुरु स्वामी रामदास जी महाराज ने जो संत सद्गुरुदेव की पहचान बताई है, वैसा ही गुरु, 'सत्संग' के योग्य होता है।

      

     संसार के प्रायः सभी धर्म संसार के सर्वभूतों (जड़ और चेतन) की उत्पत्ति शब्द से मानते हैं। सभी धर्म कहते हैं कि वह शब्द ‘प्रकाशप्रद' हैं। सर्व प्रथम शब्द और प्रकाश से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, फिर संपूर्ण ब्रह्माण्ड और त्रिगुणमयी माया की उत्पत्ति होती है। फिर त्रिगुणमयी माया अपने जनक 'शब्द' और प्रकाश (प्रकाशप्रदशब्द ) की प्रेरणा से संसार के सर्वभूतों की रचना करती है। संसार का यह सारा प्रपंच उसी प्रकाशप्रद शब्द की देन है। दूसरे शब्दों में यह सारा संसार एक ही परमसत्ता का विस्तार मात्र है। संत सद्गुरुदेव निराकार ब्रह्म का सगुण साकार स्वरूप ही होता है।

      

     अतः संत सद्गुरुदेव द्वारा प्राप्त प्रकाशप्रद शब्द की धार के सहारे उस दिव्य प्रकाश के आनन्द और रोशनी में उस पथ पर चलना सम्भव ने आदि में वह प्रकाशप्रद शब्द प्रकट होता है। उसी को अलख लोक के ऊपर वाला प्रकट होता है। उसी को अलख लोक के ऊपर वाला, अगम लोक संतों ने बारम्बार कह कर वर्णन किया है। उस लोक में जाते ही जीवात्मा अपने जनक परमात्मा में पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। इसी का नाम 'मोक्ष' है। प्रकाशप्रदशब्द के दिव्य प्रकाश से मनुष्य को अपने अन्दर उस दिव्य आनन्द की प्रत्यक्षानुभूति होने लगती है। बिना उस आनन्द की प्राप्ति के मनुष्य को मोक्ष का अर्थ ही समझ में नहीं आ सकता।

      

     जब तक संत सद्गुरुदेव की कृपा से उस दिव्य आन्तरिक आनन्द का स्वाद मनुष्य चख नहीं लेता, उसे माया के प्रभाव से बाहरी भौतिक सुख ही प्रभावित करते रहते हैं। वह बारम्बार यही कहता है कि क्या जरूरत है मोक्ष की ? संसार के इस आनन्द को छोड़ कर मोक्ष का प्रयास मूर्खता है। क्योंकि उसने उस दिव्य आन्तरिक आनन्द का स्वाद चखा ही नहीं है। इस लिए वह सांसारिक सुखों में और दिव्य आन्तरिक आनन्द में भेद समझ ही नहीं सकता है। यह सारा प्रपंच केवल उपदेश, प्रदर्शन शब्दजाल और दर्शन शास्त्र के ग्रन्थों आदि से समझ में नहीं आ सकता।

      

     ये सब मनुष्य को बुद्धि की कसरत मात्र करवा कर ज्ञानी बनने का भ्रम ही पैदा कर सकते हैं। इस समय संसार में यही भ्रम खुला बिक रहा है। अध्यात्म ज्ञान के नाम से यह संसार में सर्वत्र उपलब्ध है। क्योंकि यह ज्ञान कोई प्रत्यक्ष परिणाम नहीं देता है, इसलिए संसार के युवा वर्ग का विश्वास इससे खत्म हो चुका है। मृत्यु के करीब पहुँचे हुए शक्तिहीन स्त्री-पुरुष ही जीवन में किये हुए काम को याद करके अपनी ही तस्वीर से भयभीत होकर इसे पाने का प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि भय के कारण बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, अतः वे असन्तुलित प्राणी कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते।

      

     अध्यात्म का पतन उस समय प्रारम्भ हुआ, जब धर्म गुरुओं ने इसका सम्बन्ध पेट से जोड़ लिया। आज सभी धर्मों के धर्मगुरुओं को जीवित रहने के लिए हठ धर्मिता से अध्यात्म पर चलना पड़ रहा है। ऐसा करना उनकी मजबूरी है। इस हठधर्मी प्रवृत्ति ने संसार के लोगों को विद्रोही बना दिया। इस प्रकार अध्यात्म एक तमाशा बन चुका है। सर्व भूतों के जनक आदि कारण के प्रति ऐसा भाव परिवर्तन विशेष का द्योतक है। यह वैज्ञानिक सच्चाई है कि जब किसी बात की अति हो जाती है तो उसका अन्त हो जाता है। ऐसा होना अनिवार्य भी है। क्योंकि अनादि काल से उत्थान और पतन का यह क्रम चला आ रहा है।

      

     संसार का अन्धकार उस दिव्य ज्ञान ज्योति के उदय हुए बिना हटना असम्भव है। पहला दीपक जलना ही कठिन होता है, उसके बाद तो दीपक से दीपक जलने की प्रक्रिया के अनुसार पूरे विश्व में प्रकाश फैलने में देर नहीं लगेगी। जब यह मधुर स्वर लहरी संसार के वायु मण्डल में तरंगित होने लगेगी तो आम प्राणी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। इस प्रकार यह दिव्य प्रकाश, प्रकाश की गति से भी तेज, पूरे संसार में फैल जावेगा। प्रतिरोधक शक्तियाँ संभल भी नहीं पाएंगी। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि वे बिना विरोध के शान्त हो जाएंगी। उस परमसत्ता को संसार से उनका सफाया करना है। अतः उस विकृति के सफाये के लिए अन्धेरे और उजाले का संघर्ष अनिवार्य है। इसके बिना पूर्ण शान्ति असम्भव है। यह क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है। पाप का अन्त कुरुक्षेत्र में ही होता है। महर्षि श्री अरविन्द की यह घोषणा कि वह परमसत्ता भारत की भूमि पर 24 नवम्बर 1926 को अवतरित हो चुकी है, गलत नहीं है। उसके अवतरित होने का स्पष्ट अर्थ है, अन्धकार का सफाया। ऐसा अनादि काल से होता आया है। हमें इतिहास को ध्यान में रखते हुए ऐसे संघर्षों से घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि ऐसा होना अनिवार्य है। ऐसा अनादि काल से होता आया है।

      

     संसार में अन्धकार से जो संहार और हा-हा कार मचा हुआ है। वह पूर्ण शान्ति का उषाकाल है। दीपक जब बुझते समय तेज प्रकाश फैलाता है, वैसे ही अन्धकार मिटने से पहिले भयंकर तबाही मचाता है। यह प्रकृति का अटल नियम है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग