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यह सम्पूर्ण संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है।

     भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के 10 वें अध्याय के 39 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है:-

      

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।      

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥10:39॥

      

     "और हे अर्जुन ! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ। क्योंकि वह चर और अचर भूत नहीं है, जो मेरे रहित होवे। इसे और स्पष्ट करते हुए 42वें श्लोक में कहा है :-

      

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।      

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 10:42॥

      

     "अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है। मैं इस सम्पूर्ण जगत् को एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।'' ऐसी स्थिति में संसार में जो कुछ हो रहा है, उसका दोष किसी को भी देना व्यर्थ है। वह परमसत्ता सब भूत प्राणियों को भरमाते हुए अपनी इच्छा के अनुसार चला रही है। इस सम्बन्ध में महर्षि अरविन्द को भगवान् ने अलीपुर जेल में जो आदेश दिया था, उससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर भारत में निश्चित रूप से अवतरित हो चुके हैं।

      

     भगवान् ने कहा है :- ''मैं इस देश को अपना संदेश फैलाने के लिए उठा रहा हूँ, यह संदेश उस सनातन धर्म का संदेश है जिसे तुम अभी तक नहीं जानते थे, पर अब जान गये हो। तुम बाहर जाओ तो अपने देशवासियों से कहना कि तुम सनातन धर्म के लिए उठ रहे हो, तुम्हें स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं, अपितु संसार के लिए उठाया जा रहा है। श्री अरविन्द को दिये उपर्युक्त आदेश से मालूम होता है कि वह परमसत्ता इस देश में अवतरित होकर संसार भर में पुनः सनातन धर्म की एक मात्र सत्ता स्थापित करके, युग परिवर्तन करना चाहती है। ईसाई धर्म के संतों की यह भविष्यवाणी है कि:-"बीसवीं शताब्दी के अन्त तक चर्चा का अस्तित्व मिट जायेगा।

      

     यीशु ने अपने अन्तिम दिनों में स्वयं अपने शिष्यों से कहा था :- मैं तुम्हें सच्चाई बताता हूँ। यह तुम्हारे लिए लाभदायक है कि मैं तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूँ। यदि मैं न जाऊँ तो वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। पर यदि मैं जाऊँ तो उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आ जाएगा तो वह संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में दोषी ठहराएगा। पाप के विषय में इसलिए कि संसार के लोगों ने मुझ पर विश्वास नहीं किया। धार्मिकता के विषय में इसलिए कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ और तुम मुझे फिर न देखोगे। न्याय के विषय में इसलिए कि इस संसार का शासक दोषी ठहराया गया है।

      

     मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, पर अभी तुम उन्हें सहन नहीं कर सकते ।जब वह सत्य का आत्मा आएगा, तब वह सम्पूर्ण सत्य में तुम्हारा मार्ग दर्शन करेगा। वह अपनी ओर से कुछ नहीं कहेगा। जो बातें वह सुनेगा, वही कहेगा। वह होने वाली घटनाओं के विषय में तुम्हें बतलाएगा। वह मेरी महिमा करेगा क्योंकि वह मेरी बातें ग्रहण करेगा और तुम्हें बताएगा। जो पिता है, वह मेरा है इसलिए मैंने कहा कि आत्मा मेरी बात ग्रहण करेगा और तुम्हें बताएगा।

      

     यह शब्द कि ''जो पिता का है वह मेरा है'' स्पष्ट करता है कि जो शक्ति अवतरित होगी, उसका सीधा सम्पर्क उस परमसत्ता से होगा। क्योंकि आगे होने वाली बात ईश्वर के सिवाय कोई भी नहीं जान सकता। भगवान् ने 10 वें अध्याय के 34 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

      

मृत्युः सर्वहरचाह मुभवश्च भविष्यताम्।      

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।। 10:34।।

      

      मैं सब का नाश करने वाला, मृत्यु और आगे होनेवालों की उत्पत्ति का कारण (हूँ) तथा स्त्रियों में कीर्ति श्री, वाक्, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।

      

     उपर्युक्त श्लोक में भगवान् ने कहा है कि संसार में आगे होने वालों की उत्पत्ति का कारण केवल वही है। यीशु का यह कहना है कि वह सत्य की आत्मा 'आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा'' स्पष्ट करता है कि वह पूर्ण सत्ता ही मनुष्य के रूप में अवतरित होगी। इसी प्रकार संसार के अनेक संत उस परम सत्ता के अवतरित होने की भविष्यवाणियाँ काफी समय से कर रहे हैं।

      

     15वीं शताब्दी में ब्रिटेन की एक महिला ने घोषणा की थी कि ''बीसवीं सदी के आखिरी दो दशकों में सारा संसार ग्रह युद्ध की लपेट में आकर भारी जन-धन की हानि उठाएगा। अन्त में 20वीं सदी के आखिरी दशक में भारत के उत्तरी हिस्से में एक ऐसा मनुष्य प्रकट होगा जो संसार को सम्बोधित करेगा। उसकी सभी बातें सत्य होगी और सारा संसार उसकी बातों का अनुसरण करने लगेगा। इस प्रकार 21वीं सदी में पूरे संसार में सुख शान्ति स्थापित हो जायेगी और भारत पुनः जगत्गुरु का स्थान ग्रहण कर लेगा अतः श्री अरविन्द ने 24 नवम्बर 1926 को भगवान् श्रीकृष्ण के अवतरण की जो घोषणा की है वह सत्य प्रमाणित होगी।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग