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सात्विक आराधना का फल कभी नष्ट नहीं होता।

      

     संसार की हर वस्तु नाशवान है, परन्तु ईश्वर भक्ति का फल कभी भी नष्ट नहीं होता है। वह हर जन्म में निरन्तर बढ़ता ही जाता है। इसके बारे में अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से पूछा :-

      

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।      

अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति।।6:37॥

      

     हे कृष्ण ! योग से चलायमान हो गया है मन जिनका, ऐसा शिथिल यत्न वाला श्रद्धायुक्त पुरुष योग सिद्धि को न प्राप्त होकर, किस गति को प्राप्त होता है। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन :-

      

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।

न हि कल्याणकृत्कश्चिदुर्गति तात गच्छति ॥ 6:40॥

      

     हे पार्थ, उस पुरुष का न तो इस लोक में (और) न परलोक में ही नाश होता है, क्योंकि हे प्यारे कोई भी शुभ कर्म करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।

      

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।

शुचीनां श्रीमता गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥6:41।।

      

     योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, बहुत वर्षों तक वास करके, शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषों के घर में जन्म लेता है।

      

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।

एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीद्दशम्॥6:42॥

      

     अथवा ज्ञानवान् योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। इस प्रकार का जो यह जन्म है, संसार में निःसन्देह अति दुर्लभ है।

      

तत्र तं बुद्धिसंयोग लभते पौर्वदेहिकम्।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥6:43॥

      

     वहाँ उस पहले शरीर में साधन किये हुए बुद्धि के संयोग को अनायास ही प्राप्त हो जाता है, और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से फिर भगवत् प्राप्ति के निमित्त यत्न करता है।

      

पूर्वाभ्यासेन तेनैव हृियते ह्यवशोऽपि सः।

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द ब्रह्मातिवर्तते ॥6:44।।

      

     वह विषयों के वश में हुआ भी उस पहिले के अभ्यास से ही निःसन्देह भगवत् की ओर आकर्षित किया जाता है। समत्वबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल का उल्लंघन कर जाता है।

      

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्ध किल्बिषः।

अनेकजन्मसद्धिस्ततो याति परां गतिम॥6:45॥

      

     अनेक जन्मों से अन्तः करण की शुद्धि रूप सिद्धि को प्राप्त हुआ और अति प्रयत्न से अभ्यास करने वाला योगी, संपूर्ण पापों से अच्छी प्रकार शुद्ध होकर, उस साधन के प्रभाव से परम गति को प्राप्त होता है।

      

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

कर्मिभ्यश्राधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन। 6:46॥

      

     योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, और शास्त्र के ज्ञानवालों से भी श्रेष्ठ माना गया है, सकाम कर्म करने वालों से (भी) योगी श्रेष्ठ है, इसलिये हे अर्जुन (तू) योगी हो।

      

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।

श्रद्धावान्भजते यो मांस मे युक्ततमो मतः ॥ 6:47॥

      

     संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान् योगी मेरे में लगे हुए, अन्तरात्मा से मेरे को निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य है।''

      

     भगवान् ने उपर्युक्त आदेश से यह स्पष्ट कर दिया कि आराधना का फल मोक्ष पर्यन्त नष्ट नहीं होता। एक बार जब यह क्रम प्रारम्भ हो जाता है। तो जन्म दर जन्म इसका स्तर ऊपर उठता ही जायेगा, और इसका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष होगा। कभी-कभी हमें यह देख कर आश्चर्य होता है कि कोई मानव अनायास साधारण स्तर से बहुत ऊपर उठकर 'आध्यात्मिक शक्ति की प्रत्यक्षानुभूति करने लगता है।

      

     ऐसी स्थिति में हमें समझ लेना चाहिए कि उसके पाप कर्म पूर्ण रूप से नष्ट हो चुके हैं, और पूर्व जन्म के संचित शुभ कर्मों का कर्मफल मिलना प्रारम्भ हो गया है। ऐसी स्थिति अगर जवानी में ही हो जाय तो निश्चित रूप से यह उसका अन्तिम जन्म होगा। आज्ञा चक्र से ऊपर की यात्रा का प्रारम्भ इसका स्पष्ट संकेत है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग