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अध्यात्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान

      

     उत्थान-पतन के प्रकृति के अटल सिद्धांत के कारण आज योग-दर्शन लोप प्रायः हो चुका है, जबकि सांख्य-दर्शन ( भौतिक विज्ञान ) ने बहुत अधिक तरक्की कर ली है। ज्यों-ज्यों भौतिक विज्ञान उन्नति करता गया, अध्यात्म विज्ञान स्थिर भी नहीं रह सका बल्कि अधोगमन करने लगा। भौतिक विज्ञान के आचार्यों ने जब अध्यात्म-विज्ञान के आचार्यों से पूछा कि भौतिक विज्ञान ने प्राणियों के लाभ और सुख के लिए अमुक-अमुक कार्य किये, आपके विज्ञान की क्या स्थिति है।

      

     क्योंकि अध्यात्म जगत् के लोग, उन सकारात्मक जगत् के लोगों को उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे, अतः उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए एक काल्पनिक लक्ष्मण रेखा से विश्व को दो भागों में विभक्त कर दिया। स्वयं को आस्तिक घोषित कर दिया, और भौतिक विज्ञान के सच्चे लोगों को नास्तिक की संज्ञा देकर अपनी झेप मिटाने का असफल प्रयास करने लगे।

      

     होना तो यह चाहिए था कि अपनी कमजोरी को खुले दिलदिमाग से स्वीकार करके शौध कार्य में लग जाते, परन्तु कलियुग के गुण-धर्म ने ऐसा नहीं करने दिया। उन्होंने परमात्मा को पेट में डाल लिया तभी तो स्वामी श्री विवेकानन्द जी ने अमेरिका से अपने एक पत्र में लिखा था।तुम लोगों में किसी प्रकार की धार्मिक भावना नहीं है। रसोई ही तुम्हारा ईश्वर है तथा हण्डिया-बर्तन हैं, तुम्हारा धर्म शास्त्र, अपनी तरह की असंख्य सन्तानोत्पादन में, तुम्हारी शक्ति का परिचय मिलता हैं।

      

     (द कम्पलीट वर्कस ऑफ स्वामी विवेकानन्द-वॉल्युम.5)

      

     एक बार मनुष्य झूठ बोल देता है तो उसे छिपाने के लिए झूठ पर झूठ बोलता ही चला जाता है। इस प्रकार वह मात्र झूठ के अम्बार ही लगाता है। योगदर्शन मात्र वेदान्त दर्शन की देन है।

      

     करीब सौ साल पहले, स्वामी जी का लिखा पत्र, हमारे धर्म का जो चित्र प्रस्तुत करता है। वह बहुत ही निराशाजनक है। हमें इसे स्वीकार करना पड़ेगा कि कलियुग के गुणधर्म के कारण आज हम उस स्थिति से कुछ नीचे ही गिरे हैं। हम योग का जो ढोल पीट रहे हैं, उसका उस योग से कोई संबंध नहीं जो वेदरूपी कल्पतरू का अमर फल है। हमारे योगियों ने जिस योग की महिमा की है। वह मानव के त्रिविध ताप-आधिदैहिक, आधिभौतिक और आधिदैविक का शमन (नाश ) करने के साथ-साथ कैवल्यपद अर्थात् मोक्ष देता है। इस समय हम शारीरिक कसरत को ही योग कह रहे हैं।

      

     पातंजलि योग दर्शन में जिस क्रियात्मक ढंग से त्रिविध तापों का शमन करते हुए, सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान की पूर्ण जानकारी प्राप्त करते हुए, कैवल्य पद प्राप्त करने का वर्णन हैं वही वेद रूपी कल्पतरू का अमर फल अर्थात सिद्ध योग (पूर्ण योग)। महर्षि श्री अरविन्द ने इसी योग का वर्णन करते हुए, कहा है- "भारत, जीवन के सामने योग का आदर्श रखने के लिए उठ रहा है। वह योग के द्वारा ही सच्ची स्वाधीनता, एकता और महानता प्राप्त करेगा और योग के द्वारा ही उसका रक्षण करेगा।"

      

     इसी संदर्भ में महर्षि ने कहा है -एशिया जगत् हृदय की शांति का रखवाला है। यूरोप की पैदा की हुई बीमारियों को ठीक करने वाला है। यूरोप ने भौतिक-विज्ञान नियन्त्रित-राजनीति, उद्योग, व्यापार आदि में बहुत प्रगति कर ली है। अब भारत का काम शुरू होता है। उसे इन सब चीजों को आध्यात्मिक सत्ता के अधीन करके धरती पर स्वर्ग बसाना है।

      

     आज धार्मिक दृष्टि से विश्व की वस्तुस्थिति यह है कि सम्पूर्ण युवा वर्ग का धर्म पर से विश्वास प्रायः समाप्त हो चुका है। क्योंकि विज्ञान एक सच्चाई है। वह प्रत्यक्ष परिणाम देता है। अतः सभी लोग उसको सत्य मान रहे हैं। दूसरी तरफ जब धर्माचार्यों ने हठधर्मी रूख अपनाया तो विश्व भर के युवा लोगों ने इनके खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। आज ईश्वर एक कल्पना का विषय है। पश्चिमी जगत् में सेवारत एक डॉक्टर ने बात-चीत के दौरान मुझे बताया कि पश्चिम का युवा-वर्ग, ईश्वर में बिल्कुल ही विश्वास नहीं रखता है। उन्होंने कहा कि मेरा छोटा पुत्र ऑक्सफॉर्ड में पढ़ा रहा है, उसकी मान्यता है कि कमजोर, डरपोक और बुजदिल लोग ही ईश्वर नाम की काल्पनिक शक्ति का सहारा लेने का असफल प्रयास करते हैं।

      

     ऐसी स्थिति में मात्र कब्र में पाँव लटके हुए लोग धर्म की रक्षा कितने दिन और कैसे करेंगे ? ऐसा लगता है कि संसार के लोग पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का डर दिखाकर जो धर्म चला रहे हैं, वह आखिरी सांसे गिन रहा है। ईश्वर के नाम से भय तो दूर भागता है और स्वर्ग-नरक रूपी बन्धनों से बाँधकर, भय से भगवान् की प्रत्यक्षानुभूति करवाई जा रही है।

      

     बिल्कुल उल्टी गंगा बहाई जा रही है। आज विश्व के सभी सकारात्मक लोगों को, पूर्वाग्रहों को त्याग कर, जाति, धर्म और देशों की संकीर्ण भावनाओं का त्याग करके, सोचने की जरूरत है कि मानव धर्म कैसे बचें ? विश्व शांति का मात्र यही उपाय शेष बचा है।

      

     महर्षि श्री अरविन्द के अनुसार पश्चिम के लोग जो कुछ कर सकते थे, वे कर चुके हैं। इसके आगे का काम करने की उनमें सामर्थ्य है ही नहीं। जिन यंत्रों को वह परमसत्ता, संसार को दे चुकी है, उनकी पकड़ में वह नहीं आयेगी। वे लोग मानवीय बुद्धि से उन यंत्रों द्वारा जो परीक्षण कर रहे हैं, वह पूर्णरूप से संदिग्ध है। यह कार्य तो हमारे ऋषियों द्वारा बताये हुए तरीके से ही होगा। मात्र सुषुम्ना के रास्ते से ही उस चक्रव्यूह का भेदन संभव है, जहाँ से वह परमसत्ता विश्व का संचालन कर रही है। कुछ माह पूर्व बी.बी.सी.ने लगातार तीन बुद्धवार को चेतन-अवचेतन पर वैज्ञानिक व्याख्या प्रसारित की थी। मैंने उसे सुना था। उसके अनुसार पातंजलि दर्शन में उस परमसत्ता का वर्णन करते हुए सहस्रार में उसके स्थित होने की बात कही गई हैं। उसे आज विज्ञान पूर्ण सत्य मानता है।

      

     उस चक्रव्यूह के अन्दर घुसने की विधि तो मात्र हमारा योग दर्शन ही बताता है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए विश्व को, भारत को धर्म-गुरु स्वीकार करना ही पड़ेगा। भौतिक ज्ञान की कीमत भौतिक धन है। अध्यात्म ज्ञान को भौतिक धन से नहीं खरीदा जा सकता और न ही कभी बेचा जा सकेगा। उसके लिए तो आध्यात्मिक संत के सामने पूर्ण समर्पण करना पड़ेगा। तथा तन,मन,धन से निष्कपट भाव से उसकी सेवा करनी पड़ेगी।

      

     उस परम आत्मा सद्गुरु देव के दिल से प्रसन्न होने पर ही यह ज्ञान मिलता है अन्यथा नहीं। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के चौथे अध्याय के 34वें श्लोक में कहा है।

      

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥:34॥

      

     इसलिए तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी पुरूषों से भली प्रकार दण्डवत प्रणाम सेवा (और ) निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा उस ज्ञान को जानकर वे मर्म को जानने वाली ज्ञानी जन ( तुझे उस) ज्ञान का उपदेश करेंगे। इस संबंध में कबीर जी ने कहा हैं।

      

     गुरु मिलि ताके खुले कपाट, बहुरि न आवे योनी बाट। (कबीर ग्रंथावली-पृष्ठ 283) "मनुष्य योनि ईश्वर की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है।'' मनुष्य योनि में ईश्वर के तद्रूप बना जा सकता है। इस संबंध में श्री कृष्ण ने गीता के 13वें अध्याय के 22वें श्लोक में कहा हैं।

      

उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरूषः परः ।।13:22॥

      

     वास्तव में तो यह पुरूष इस देह में स्थित हुआ भी पर ( त्रिगुणातीत ) ही हैं (केवल साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता (एवं ) सबको धारण करने वाला होने से भर्ता, जीवनरूप से भोक्ता (तथा ) ब्रह्मादिकों का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्द घन होने से 'परमात्मा' ऐसा कहा गया हैं।)

      

     पांतजलि योगदर्शन में साधनपाद के 21वें श्लोक में योग के आठ अंगों यथा-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का वर्णन हैं। बौद्धिक प्रयास से इस युग में उनका पालन करना असम्भव है। इसीलिए इतने महत्त्वपूर्ण दर्शन के बारे में नगण्य लोगों को ही जानकारी है। परन्तु गुरु-शिष्य परम्परा में शक्तिपात दीक्षा से कुण्डलिनी जाग्रत करने का सिद्धान्त है। सिद्धगुरु साधक की शक्ति (कुण्डलिनी) को चेतन करते हैं। वह जाग्रत कण्डलिनी साधक को उपर्यक्त अष्टांगयोग की सभी साधना स्वयं अपने अधीन करवाती है। इस प्रकार जो योग होता है उसे सिद्धयोग अर्थात महायोग कहते हैं। यह एक अखंड मार्ग है। जाग्रत कुण्डलिनी पर गुरु का पूर्ण प्रभुत्व होता है, जिससे वह उसके वेग को अनुशासित और नियंत्रित करते हैं। शक्तिपात दीक्षा के बाद साधक के प्रारब्ध कर्मों के अनुसार शक्ति का विविध रीति से प्रकटीकरण होता हैं।

      

     किसी साधक को शक्तिपात होते ही विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाए जैसे आसन् बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम आदि स्वतः होने लगती हैं। किसी को ज्योति दर्शन, नाद, दिव्यगन्ध, रस-स्पर्श-रूप का अनुभव होता है। किसी साधक को सुषुम्ना नाड़ी में चक्रों और ग्रंथियों के वेधन का अनुभव होता है।

      

     मेरे संत सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाई नाथ जी योगी की अहैतु की कृपा के कारण मुझे अनायास ही शक्तिपात की सामर्थ्य प्राप्त हो गई। मेरे शिष्यों में सैकड़ों (स्त्री-पुरूष ) साधकों को उपर्युक्त सभी यौगिक क्रियाएँ जैसे आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम स्वतः होने लगती हैं। साधक न तो उसे रोकने की क्षमता रखता है, और न करने की। वह तो मात्र गुरु द्वारा प्राप्त मंत्र का मानसिक जप करता, आज्ञाचक पर गुरु के स्वरूप का ध्यान करते हुए, आँख बंद किये, सहज आसन में बैठा रहता है। सभी प्रकार की यौगिक क्रियाएँ, वह चेतनशक्ति (कुण्डलिनी ) सीधा अपने अधीन स्वयं करवाती है। वह शक्ति साधक का शरीर, प्राण, मन एवं बुद्धि अपने अधीन कर लेती है। साधक की आँखें बंद रहती है। परन्तु आंतरिक चक्षु खुल जाते हैं। जिससे साधक को 72 हजार नाड़ियों सहित कुण्डलिनी छह चक्र और तीनों ग्रंथियाँ स्पष्ट दिखती हैं। सभी अंगों की आंतरिक क्रियाएँ साधक को स्पष्ट दिखाई देती हैं। कौन से अंग में किस प्रकार क्रियाएँ हो रही हैं, ध्यान की अवस्था में उसे स्पष्ट दिखती हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पिण्ड में है। योग दर्शन के इस सिद्धांत के अनुसार पूर्ण ज्ञान, इस साधना से होता है। यह योग संसार की असंख्य समस्याओं का सामाधान करने में भौतिक-विज्ञान को सक्षम बनाएगा।

      

     भारतीय योगदर्शन मनुष्य को विकास के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने के साथ-साथ मोक्ष भी देता है। यह योग मनुष्य को सभी प्रकार के रोगों से पूर्ण रूप से मुक्त करता है। रोगों से मुक्त हुए बिना शांति नहीं, और पूर्ण शांति के बिना मोक्ष असम्भव है। कुण्डलिनी के जाग्रत होते ही साधक को इन्द्रियातीत दिव्य अक्षय आनन्द की निरन्तर प्रत्यक्षानुभूति होती है। जिससे साधक का मानसिक तनाव पूर्ण रूप से शांत हो जाता है तथा उसके कारण उत्पन्न कई असाध्य रोग जैसे उन्माद, पागलपन, रक्तचाप, अनिद्रा आदि अनेक बीमारियाँ बिना दवा के चन्द दिनों में स्वतः ही ठीक हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त सभी शारीरिक रोग विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ करवाकर वह जगत् जननी( कुण्डलिनी) पूर्णरूप से ठीक कर देती है। उस आंतरिक चेतना शक्ति के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। ज्ञान की तो उसमें "पराकाष्ठा'' है। अतःउसके लिए कोई भी कार्य असम्भव नहीं है। दिव्य आनन्द के निरन्तर बने रहने के कारण, सभी प्रकार के नशों से पूर्णरूप से मुक्ति मिल जाती है। मेरे कई साधक अफीम, शराब, भांग, गांजा आदि नशों से बुरी तरह से ग्रसित थे। दीक्षा के बाद चन्द दिनों में ही उन्हें बिना किसी प्रकार के कष्ट के, सभी नशों से पूर्ण मुक्ति मिल गई। ऐसे अनेक मनोरोगी शक्तिपात के कारण पूर्णरूप से ठीक हो गये, जिन्हें विद्युत चिकित्सा और इन्सुलीन चिकित्सा से भी लाभ नहीं हुआ था। आज सभी बिना दवा खाये पूर्णरूप से स्वस्थ हैं, और ईश्वर का भजन करके सात्विक जीवन जी रहे हैं।

      

     इस प्रकार सभी प्रकार के मनोरोगों, शारीरिक रोगों और सभी प्रकार के नशों से, बिना किसी प्रकार का कष्ट पाये और बिना दवा के, पूर्ण रूप से मुक्ति पाने का, हमारे अध्यात्म विज्ञान में ठोस आधार है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। उपर्युक्त सभी लाभ किसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया से नहीं, अध्यात्म विज्ञान के ठोस सिद्धांतों से मिलते हैं। पातंजलि योगदर्शन के कैवल्यवाद के दूसरे श्लोक में ऋषि ने जाति (वृत्ति ) बदलने का विवरण देते हुए कहा है कि इसके बिना कार्य सिद्धि संभव नहीं है। वह किस प्रकार होता है, उस सम्बन्ध में ऋषि कहता है- 'जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्' (यह) एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना रूप जात्यन्तर परिणाम (एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना ) प्रकृति के पूर्ण होने से होता है। ऋषि के अनुसार मनुष्य मात्र तीन जाति के होते हैं। ‘सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी। औषधि, मंत्र दीक्षा आदि निमित्त कारण प्रकृतियों (वृत्तियों) की पूर्णता कैसे कर देते हैं; क्या वे प्रकृतियों (वृतियों) के प्रयोजक (चलाने वाले ) हैं? इस संबंध में ऋषि ने कहा है।

      

‘निमित्तमप्रयोजक प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्’ ॥४:३॥

      

     ‘निमित्त प्रकृतियों (वृत्तियों) को चलाने वाले नहीं है, उससे तो (केवल) किसान की भांति, रुकावट का छेदन किया जाता है। अतः संत सदगुरु देव की शक्तिपात दीक्षा के कारण प्रथम तामसिक वृत्तियाँ दबकर कमजोर पड़ जाती हैं। बाकी दोनों वृतियाँ प्राकृतिक रूप से, स्वतंत्र होने के कारण, क्रमिक रूप से विकसित होती जाती हैं। चन्द दिनों में प्रकृति उन्हें इतनी शक्तिशाली बना देती हैं कि फिर वे तामसिक वृत्तियों की शरीर में प्रधानता कभी स्थापित नहीं होने देती हैं। इसी प्रकार फिर रजोगुणी वृत्ति दब जाती है। मनुष्य क्रमिक बदलाव की अर्थात् जाति बदलने की प्रकिया से, तमोगुणी से रजोगुणी और फिर रजोगुणी से सतोगुणी जाति में बदल जाता है। शक्तिपात-दीक्षा में उपर्युक्त कार्य कुण्डलिनी शक्ति (जगत् जननी ) स्वयं अपने नियन्त्रण में करवाती है, अतः। साधक में परिवर्तन बहुत ही त्वरित गति से होता है। क्योंकि वह जगत् जननी (पृथ्वी तत्त्व) उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है, “सृष्ट्युत्पति’’ का आदि कारण है। इसलिए वह सर्वज्ञ, सर्वस्व, और सर्वत्र हैं, उसके लिए कोई कार्य कठिन नहीं है। ज्यों-ज्यों मनुष्य की जाति बदलती जाती है, उस वृत्ति के सभी गुणधर्म खत्म हो जाते हैं। जो दब चुकी है। अतः मनुष्य के खानपान, रहन-सहन, व्यवहार और आचरण आदि सभी बदल जाते हैं क्योंकि वृत्ति बदल जाती है, इसलिए उस वृत्ति के खानपान (सभी प्रकार के नशों से तथा पदार्थो) से मनुष्य को आंतरिक भाव से घृणा हो जाती है।

      

      अतः किसी प्रकार के कष्ट के बिना ही सभी प्रकार की बुरी आदतें स्वतः छूट जाती हैं। स्वामी श्री विवेकानन्द जी के शब्दों में मनुष्य उन वस्तुओं को नहीं छोड़ता है, वे वस्तुए उसे छोड़कर चली जाती हैं। इस संबंध में स्वामी जी ने अमेरिका में कहा था।- “You need not to give up the things, the things will give you up" इस संबंध में भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के १४वें अध्याय में इस संबंध में कहा है

      

सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृति संभवाः ।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥१४:५॥

      

     ‘हे अर्जुन ! सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण ऐसे (यह ) प्रकृति से उत्पन्न हुए तीनों गुण (इस) अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। इसके बाद में भगवान् तीनों गुणों की अलग-अलग व्याख्या करते हुए कहते हैं -

      

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाश कमनामयम्।।

सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ।१४:६॥

      

     ‘हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में प्रकाश करने वाला निर्विकार सत्त्वगुण (तो) निर्मल होने के कारण सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।'

      

रजो रागात्मक विद्धि तृष्णासंग समुद्भवम्।

तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥१४:७॥

      

     ‘हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न हुआ जान, (इस ) जीवात्मा को कर्मों की और उनके फल की आसक्ति से बाँधता है।'

      

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत14:8॥

      

     ‘और हे अर्जुन ! सर्व देहाभिमानियों के मोहने वाले तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न हुआ जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है।'

      

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।

ज्ञानमावृत्य तु तमःप्रसादे संजयत्युत ॥१४:९॥

      

     ‘हे अर्जुन ! सत्वगुण सुख में लगाता है (और) रजोगुण कर्म में ( तथा ) तमोगुण तो ज्ञान को आच्छादन करके (ढक के) प्रमाद में भी लगाता है।

      

रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत।

रजः सत्त्वं तमयश्चैव तमः सत्वं रजस्तथा।।१४:१०।

      

     ‘और हे अर्जुन ! रजोगुण (और) तमोगुण को दबाकर सत्वगुण बढ़ता है, तथा रजोगुण (और) सत्वगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है )

      

     उपर्युक्त श्लोकों से स्पष्ट होता है कि समर्थ संत सद्गुरु, शक्तिपात दीक्षा द्वारा साधक की कुण्डलिनी जाग्रत करके जात्यान्तरण करने में अर्थात् एक वृत्ति को दबाकर साधक को दूसरी वृत्ति में बदलने में सक्षम होता हैं। क्योंकि सभी शास्त्रों तथा संतों ने गुरु को निर्गुण निराकारं का सगुण साकार स्वरूप माना है, (अर्थात् वह परम तत्त्व, जन्म-मरण से मुक्त, गुरु के माध्यम से अपनी सम्पूर्ण शक्ति प्रकट करता है) तभी गुरु की व्याख्या करते हुए हमारे शास्त्रों स्पष्ट शब्दों में कहते हैं

      

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः । गुरुगीता ३२॥

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत॥

तदोत्तमविदां लोकानमलान्य तिपद्यते॥१४:१४॥

      

     ‘जब यह जीवात्मा सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के मलरहित लोकों को प्राप्त होता है।'

      

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसंगिषु जायते।

तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१४:१५॥

      

     रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है, तथा तमोगुणों के बढने पर मरा हुआ पुरूष मुढ़योनियों में उत्पन्न होता है।'

      

नान्यं गुणेभ्यःकर्तारं? यदा द्रष्टानुपश्यति।

गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मभावं सोऽधिगच्छति १४:१९॥

      

      ( हे अर्जुन ) 'जिस काल में द्रष्टा तीनों गुणों के सिवाय अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है और तीनों गुणों से अति परे सच्चिदानन्दघन स्वरूप मुझे परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस काल में वह पुरूष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।'

      

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि गुरु अपने शिष्य को अपनी जाति (चौथी-त्रिगुणातीत जाति ) में बदलने में पूर्णरूप से समर्थ होता है, क्योंकि वह निर्गुण निराकार का सगुण-साकार स्वरूप होता है। इसीलिए हमारे संतों ने स्पष्ट कहा हैं

      

गुरु करता गुरु कर जोगु। गुरु परमेसुर है भी होगु॥

कहु नानक प्रभिइहै जनाई। बिन गुरु मुकति नपाइ भाई । महला ५, शब्द ३:७॥

तीन लोक नौ खड में, गुरुते बड़ा न कोड़।

करता करै न कर सके, गुरु करै सो होइ॥  

     संत कबीर साखी संग्रह

      

     अतः गुरु; शिष्य को गीता के १३वें अध्याय के २२वें श्लोक में वर्णित स्वरूप के "तदूप'' बना देता है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग