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आध्यात्मिक जीवन का मतलब भौतिक संसार से विरक्ति नहीं

      

     इस युग में आध्यात्मिक जीवन की व्याख्या बड़े विचित्र ढंग से की गई है। इन मन घड़न्त और कृत्रिम जीवन मान्यताओं के कारण ही इस युग का मानव अध्यात्मवाद को निरर्थक और कोरा ढोंग मानता है। यही कारण है कि इस युग में धर्म का अधिक हास हुआ है। किसी भी कार्य के करने से उसका ठोस परिणाम निकलना चाहिए। परन्तु इस युग में आराधना का जो निर्जीव स्वरूप बचा है, वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी रूप में कोई परिणाम नहीं देता है। हमें केवल काल्पनिक रूप से कोरा विश्वास करने की आज्ञा दी जाती है।

      

     हमारे सभी संतों ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि 'धर्म' प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। केवल विश्वास का नाम धर्म नहीं है। जीवन के हर कार्य में ईश्वरीय शक्ति काम करती है। ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसमें ईश्वरीय शक्ति काम न करती हो। धर्म का संबंध बाहरी प्रदर्शनों से बिलकुल नहीं है। कोरे कर्मकाण्ड, शब्द जाल और तर्क शास्त्र से उस परम सत्ता से कभी भी साक्षात्कार संभव नहीं। इस युग में निर्जीव वस्तुओं से सजीव प्राणी को उस परम चेतन सत्ता से जोड़ने का निरर्थक प्रयास करवाया जा रहा है। त्याग, वैराग्य, तप, दान, धर्म, ज्ञान, पाप, पुण्य आदि के काल्पनिक चित्र दिखाकर मानव को गुमराह और भ्रमित करने के अलावा आज कुछ भी नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति में मानव का धर्म से विद्रोही होना न्याय संगत है। इस युग का मानव अब अंधेरे में भटकने को तैयार नहीं हैं।

      

     भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में जो उपदेश दिया और उससे अर्जुन को जो ज्ञान मिला, वही सच्चा ज्ञान है। अर्जुन ने उपदेश के बाद जो कार्य किया जो रास्ता अपनाया, वही सही मार्ग है। भौतिक विज्ञान, आध्यात्मिक शक्ति की देन है। अतः विज्ञान और अध्यात्म में भेद करना भूल है। जिस समय आध्यात्मिक शक्ति का सही ज्ञान भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को हो जाएगा, तत्काल समस्या का समाधान हो जाएगा। जब वैज्ञानिकों को उस परमसत्ता की शक्ति का ज्ञान हो जाएगा तो उनका भ्रम खत्म हो जाएगा। जब इस प्रकार भौतिक विज्ञान, अध्यात्म विज्ञान के अधीन कार्य करने लगेगा, पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आएगा।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग