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भारत की स्थिति

      

     आज भारत में जितनी तामसिकता है, उतनी किसी युग में नहीं रही। आज देश में जितना अविश्वास है, उतना पहले कभी नहीं रहा। आज देश का हर व्यक्ति एक-दूसरे को ठगने का प्रयास कर रहा है।

      

     कोई समझ नहीं पा रहा है, देश किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। ईश्वर पर सही अर्थों में किसी का विश्वास रहा ही नहीं। हर व्यक्ति भविष्य के बारे में सर्वाधिक चिन्तित है। सभी लोग लोभ, लालच के वशीभूत होकर येनकेन प्रकारेण धन संग्रह में लगे हैं। ऐसे लोगों की संख्या देश में बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। देश का आधे से ज्यादा धन, इस वृत्ति के लोगों के पास अनधिकृत रूप से काले धन के रूप में जमा किया हुआ पड़ा है। एक तरफ लोगों को खाने-पीने की मूलभूत जरूरत पूरी करने के लिए धन नहीं मिल रहा है, दूसरी तरफ खर्च करने को कोई जगह नहीं है। जब तक सरकार में बैठे लोग धार्मिक और चरित्रवान् नहीं होंगे, देश का उत्थान असंभव है।

      

     मैं देख रहा हूँ, ऐसी वृत्ति के लोगों का पतन प्रारम्भ हो चुका है, सबसे खुशी की बात तो यह है कि इस बार यह कार्य ऊपर से प्रारम्भ हुआ है, अतः नीचे तक फैलने में अधिक देर नहीं लगेगी। किसी हद तक यह परिवर्तन नीचे तक पहुँच चुका है, यह बहुत ही शुभ लक्षण है।

      

गुरु का पद ईश्वर से भी महान्

      

     वैदिक धर्म अर्थात् हिन्दू-धर्म में 'गुरु का पद', ईश्वर से भी महान् माना गया है। इस संबंध में गुरुगीता में कहा हैः

      

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुरेव साक्षात् परब्रह्म तस्मैः श्रीगुरवे नमः॥

      

     मैं नाथमत का अनुयाई हूँ। मेरे मुक्तिदाता परमश्रद्धेय सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाईनाथ जी योगी आईपंथी नाथ थे। कलियुग में नाथ मत के आदिगुरु योगेन्द्र श्री मत्स्येन्द्रनाथ जी महाराज माने गए हैं। मैं उन्हीं के आदेश से पश्चिमी जगत् में ज्ञानक्रान्ति का नेतृत्व करूंगा।

      

     भारत, इस समय घोर तामसिकता में डूबा हुआ है। भारत के उत्थान के लिए सर्व प्रथम "रजोगुण'' के विकास की आवश्यकता है। व्यावहारिक भाषा में भारतीयों की प्रथम आवश्यकता 'रोटी' की है, 'राम' का स्थान द्वितीय स्थान पर है।

      

     पश्चिमी जगत्, भौतिक सुविधाएँ भोगते-भोगते बहुत ही दुःखी हो चुका है। आज जितना अशांत 'पश्चिमी जगत' है, उतना अशांत संसार का कोई देश नहीं। आज उन्हें मात्र शांति की ही भूखा बाकी बची है। और शांति केवल राम अर्थात् ईश्वर तत्त्व ही दे सकता है। क्योंकि यह काम केवल वैदिक-धर्म अर्थात हिन्द-धर्म के मलभत सिद्धान्तों के अनुसार जीवन जीने से ही संभव है। अतः मुझे कलियुग के आदिगुरु से आदेश मिला है कि मेरा कार्य विशेष रूप से पश्चिमी जगत् को चेतन करने का है। उसी आदेश के कारण अब मैं प्राथमिक रूप से पश्चिमी जगत् में कार्य करना चाहता हूँ।

      

      21वीं सदी, मानव जाति के पूर्ण विकास का समय है, और पूर्ण विकास की क्रियात्मक विधि केवल भारत ही जानता है। अतः अब भारत का कार्य प्रारम्भ होता है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग