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"धन-शक्ति"

      

     "सारा धन भगवान् का है। वह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके मालिक नहीं न्यासी या ट्रस्टी है। आज वह उन लोगों के पास है, कल कहीं और हो सकता हैं। सब कुछ उस पर निर्भर है कि जब तक धन उसके पास है, वे अपनी धरोहर को किस प्रकार रखते हैं, उसका किस भाव से, किस चेतना से, किस उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं। किसी को उसके धन के कारण ऊँचा न समझो, और न उसके आडम्बर, शक्ति या प्रभाव का अपने ऊपर असर होने दो।"

      

     महर्षि श्री अरविन्द ने धन की शक्ति के विषय में लिखा हैं-'धन एक वैभव-शक्ति का प्रत्यक्ष 'चिह्न' है। यह शक्ति धरती पर प्रकट होकर 'प्राण' और 'जड़' पर कार्य करती है और 'बाहरी जीवन' की पूर्णता के लिए यह अनिवार्य है। अपने मूल और वास्तविक कर्म की दृष्टि से यह 'भगवान्' की शक्ति है। परन्तु भगवान् की अन्य शक्तियों की भांति यह शक्ति भी यहाँ औरों को सौंप दी गई है, और निम्नतर प्रकृति के अज्ञान में इसका अपहरण 'अहंकार' के उपयोग के लिए हो सकता है या आसुरी प्रभावों की पकड़ में आकर "उनके" उद्देश्यों के लिए विकृत की जा सकती है।

      

     वास्तव में यह उन तीन शक्तियों-सत्ता, धन, काम-वासना में से एक है, जिनके लिए मानव अहंकार और असुरों का सबसे अधिक आकर्षण होता है और जिन लोगों के पास ये हैं, वे अधिकतर इनके अनधिकारी हैं और इनका दुरुपयोग ही करते हैं।

      

     धन को खोजने वाले या रखने वाले उसके स्वामी नहीं, दास ही होते हैं। बहुत कम ही लोग उस विकृतिकारक प्रभाव से पूरी तरह बच पाते हैं, जिनकी छाप लम्बे समय से असुरों के हाथों में रहने और उनके द्वारा इसका दुरुपयोग होने से इस पर लग गई है। इसी कारण अधिकांश आध्यात्मिक साधनामार्ग, आत्मसंयम और अनासक्ति पर तथा धन के सारे बन्धनों और उसे पाने की सारी व्यक्तिगत और अंहकार युक्त अभिलाषा के त्याग पर बल देते हैं। यहाँ तक कि कुछ तो धन और वैभव पर प्रतिबन्ध लगा देते हैं और जीवन की दरिद्रता तथा रिक्तता को ही एकमात्र आध्यात्मिक अवस्था घोषित कर देते हैं।

      

     किन्तु यह एक भूल है, जो शक्ति को विरोधी सत्ताओं के हाथों में छोड़ देते हैं। यह भगवान् की है और भगवान् के लिए पुनः जीतना और भागवत जीवन के लिए, भागवत भाव से उसका उपयोग करना है, यही साधक के लिए "अतिमानसिक मार्ग" है। सारा धन भगवान् का है।

      

     वह जिन लोगों के हाथ में है, वे उसके मालिक नहीं न्यासी या ट्रस्टी है। आज वह उन लोगों के पास है, कल कहीं और हो सकता है। सब कुछ उस पर निर्भर है कि जब तक धन उसके पास है, वे अपनी धरोहर को किस प्रकार रखते हैं, उसका किस भाव से, किस चेतना से, किस उद्देश्य के लिए उपयोग करते हैं। किसी को उसके धन के कारण ऊँचा न समझो, और न उसके आडम्बर, शक्ति या प्रभाव का अपने ऊपर असर होने दो। माँ के लिए जब किसी से माँगो तो यह अनुभव करो कि तुम्हारे द्वारा माँ की उस वस्तु का एक छोटा सा अंशमात्र ही माँ माँग रही है। जो उनकी है और तुम जिस व्यक्ति से माँगते हो, उसकी जाँच उसके उत्तर से होगी।

      

     यदि तुम धन के दोष से मुक्त हो- लेकिन बिना वैरागियों की सी विरक्ति से तो तुम्हें भगवान् के काम के लिए धन पर अधिकार करने की अधिक क्षमता प्राप्त होगी। मन की समता, माँग का अभाव और जो कुछ तुम्हारे पास है और तुम्हें मिलता है, जो कुछ तुम्हारी उपार्जन शक्ति है, उस सबका भगवती शक्ति के चरणों में और उसी के कार्य में पूरा अर्पण, ये इस मुक्ति के लक्षण हैं।

      

     धन के संबंध में या उसके उपयोग में किसी प्रकार की चंचलता, अधिकार भावना या अनिच्छा का होना किसी न किसी अपूर्णता या बन्धन का निश्चित चिह्न है।

      

     चूंकि आजकल धन शक्ति विरोधी शक्तियों के हाथ में है, अतः स्वाभाविक रूप से हमें उनके साथ ‘लड़ना’ पड़ेगा। वे जब कभी देखेंगी कि तुम उन्हें निकाल बाहर करने की कोशिश में हो, वे तुम्हारे प्रयत्नों को असफल करने की कोशिश करेंगी, तुम्हें उनको नीचा दिखाने के लिए उनसे ज्यादा 'ऊँची शक्ति' को यहाँ उतारना पड़ेगा।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग