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भारत का भविष्य

      

     भारत सदियों तक गुलाम रहा, इसलिए इस पवित्र भूमि पर अंधकार ठोस बनकर जम गया है। वैदान्तियों को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व के धर्मों के अनुयाइयों का विकास अभी द्वैत भाव तक ही हुआ है। आज भारत में भी द्वैतवादियों का ही बोलबाला है। दर्शन के हिसाब से भारत अद्वैतवाद तक सदियों पहले विकसित हो चुका था। यह सत्य हमारे दार्शनिक ग्रन्थों से पूर्ण सत्य प्रमाणित होता है।

      

     प्रकृति का एक अटल सिद्वान्त है- उत्थान-पतन। पतन की भी एक सीमा होती है। भारत उस सीमा तक पहुँच चुका है। | इस संबंध में महर्षि श्री अरविन्द ने कहा हैः

      

     "भारत की नियति का सूर्य उदय हो चुका है। अब प्रवाह ऊपर की ओर है। पतन का काल समाप्त हो गया है। अब प्रभात निकट है, और अगर एक बार प्रकाश अपना दर्शन दे दें तो रात्रि फिर कभी नहीं हो सकती। उषा काल शीघ्र ही पूरा हो जाएगा, और सूर्य क्षितिज पर उदित होगा। भारत की नियति का सूर्य उदित होगा, और समस्त भारत को अपनी ज्योति से भर देगा। और केवल भारत को ही नहीं एशिया और जगत् भर को प्लावित कर देगा। हर घड़ी, हर पल उन्हें दिवस की क्रान्ति और दीप्ति के निकट लाते हैं जिसकी स्वीकृति भगवान् ने दी है।

      

     पतन का काल समाप्त हो गया है। नया भारत उठ रहा है। सचेतन हो रहा है, और राष्ट्रों की बिरादरी में अपना उचित स्थान लेने की तैयारी कर रहा है।

      

     महर्षि श्री अरविन्द ने भारत तथा सम्पूर्ण विश्व को अन्तर्दृष्टि से जितना निकट से देखा है, उतना कम ही लोगों ने देखा है। श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि "आगामी मानव-जाति दिव्य शरीर धारण करेगी।" इसका स्पष्ट अर्थ है मानव-जाति हमारे अद्वैतवाद के सिद्धान्त के अनुसार क्रमिक विकास के सिद्धान्त के मुताबिक पूर्णता प्राप्त कर लेगी।

      

     मैंने परिस्थितियों वश सन् 1968 में, सर्दियों में आरम्भ होने वाली नवरात्रि पर्व से, गायत्री मंत्र का अनुष्ठान प्रारम्भ किया। सवा लाख मंत्रों का जप, हवन कुण्ड में प्रत्येक मंत्र के बाद स्वाहा के साथ आहुति देते हुए किया। 1969 के प्रारम्भ में मुझे गायत्री मंत्र की सिद्धि हो गई।

      

     मुझमें हुए इस परिवर्तन के कारण ही मेरे माध्यम से मानवता में यह दिव्य परिवर्तन आ रहा है। भविष्य में मानवता में होने वाले इस परिवर्तन को देख कर ही श्री अरविन्द ने भविष्यवाणी की है कि आगामी मानव जाति दिव्य शरीर धारण करेगी।''।

      

     क्योंकि यह विकास सार्वभौम है, अतः सम्पूर्ण विश्व इससे प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकता।

      

श्री रामकृष्ण परमहंस को कैंसर क्यों?

      

     एक शिष्य ने श्री अरविन्द से प्रश्न किया- कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस को कैंसर अपने शिष्यों के पाप के कारण हुआ?

       श्री अरविन्द- हाँ यह बात उन्होंने स्वयं कही थी, और उनकी बात ठीक होनी ही चाहिए। तुम्हें पता है, उन्होंने इस बात के पक्ष और विपक्ष में युक्तियाँ दी थी कि गुरु को शिष्यों की बहुत सी चीजें अपने ऊपर लेनी पड़ती है।

      एक प्रसिद्ध योगी ने अपने शिष्य से, जब वह गुरु बनने लगा तब कहा था, "अब तुम अपनी कठिनाइयों के अतिरिक्त औरों की कठिनाइयाँ भी अपने ऊपर ले रहो हो।'

      हाँ, अगर गुरु चाहे तो शिष्यों से अपना संबंध काट सकता है, तब ( गुरु को) ऐसी कोई कठिनाई नहीं आएगी, लेकिन साथ ही उसका मतलब होगा कि काम आगे नहीं बढ़ेगा और साधक अपनी किस्मत पर बिना किसी सहारे के छोड़ दिए जाएँगे।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग