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आराधना का जवाब क्यों नहीं मिलता?

      

     इस प्रकार प्रथम आत्म जागृति ही कठिन है। जिस प्रकार एक दीपक के प्रज्वलित होने पर दीपों से दीप जलाने में कोई देर नहीं लगती। इसी प्रकार एक जलता दीपक असंख्य दीपक जला कर संसार का अन्धेरा खत्म कर सकता है। एक चेतन गुरु ही संसार के लिए पर्याप्त है।

      

     संसार में हर कार्य का फल मिलता है। हम कोई भी कार्य करें, उसका परिणाम अवश्य होगा। परिणाम हमारी इच्छा के अनुसार मिलना कोई जरूरी नहीं, परन्तु कोई भी कार्य निरर्थक नहीं होता। हम जो कुछ भी करते हैं। दूसरी तरफ से प्रत्युत्तर अवश्य मिलता है, वह सकारात्मक या नकारात्मक हो सकता है, परन्तु निरूतर नहीं रहता। परन्तु हम देखते हैं आध्यात्मिक आराधना का हमें कोई उत्तर नहीं मिल रहा है। हम काल्पनिक विश्वास से चाहे अपने आप कुछ भी मान लें, परन्तु प्रत्युत्तर जैसी बात नहीं होती।

      

      भौतिक जगत् में हम किसी की सेवा करते हैं तो उसके बदले हमें कुछ न कुछ मिलता है। जो कुछ मिलता है। उसकी प्रत्यक्षानुभूति होती है और देने वाले की भी प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार होता है। जो कुछ भी हम खाते पीते हैं, उस वस्तु के गुण धर्म के अनुसार हमें स्वाद और आनन्द मिलता है और वह वस्तु अपना प्रत्यक्ष प्रभाव भी दिखाती है। परन्तु आध्यात्मिक जगत् में यह सिद्धान्त पूर्णरूप से असफल क्यों हो रहा है? इस इकतरफा कार्य को करते-करते संसार के लोग निराश हो चुके हैं।

      

     धर्म गुरु अशिक्षित और भोले भाले लोगों को तर्क के आधार पर निरूतर करके अन्धविश्वास के सहारे चलने को मजबूर कर देते हैं। परन्तु बुद्धिजीवी और युवावर्ग बिना परिणाम के उनके आदेश को मानने को तैयार नहीं है। हमें इस पर निष्पक्ष होकर विचार करना ही पड़ेगा। यह मानव समाज में एक ऐसी भयंकर बीमारी फैल चुकी है, जिसने संसार के लोगों से सुख शान्ति छीन ली है। इस समय संसार में प्रकट शक्ति को अगर पूर्ण रूप से सृजन में लगा दिया जाय तो पृथ्वी पर स्वर्ग उतर सकता है। हम देखते हैं संसार की पूर्ण व्यक्त शक्ति का करीब 75 प्रतिशत भाग संहार और विध्वंस के लिए खर्च किया जा रहा है। हर व्यक्ति चालाकी और होशियारी के द्वारा औरों का शोषण और दमन करके सुखी बनने के प्रयास के बावजूद दुःखी और अशान्त निरन्तर होता जा रहा है।

      

     यही स्थिति संसार के सभी राष्ट्रों की है। सारे संसार में आज जितना अन्धकार व्याप्त हुआ है, पहले कभी नहीं था। हम देख रहे हैं कि इस समय तो धर्म की आड़ में भी संसार के मानव का भारी शोषण होने लगा है। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक का भय दिखाकर जितना शोषण संसार के सभी धर्मों में इस समय हो रहा है, पहले कभी नहीं हुआ। संसार में इस समय जितनी भी आराधना पद्धतियाँ प्रचलित हैं, वे प्रायः सभी बहिर्मुखी हैं। इसके अलावा निर्जीव वस्तुओं के माध्यम से सभी धर्म गुरु आराधना करवा रहे हैं।

      

     कोई भी भौतिक निर्जीव वस्तु स्वयं मनुष्य का भला बुरा करने की स्थिति में नहीं होती। ऐसी स्थिति में प्रत्युत्तर मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता। हमारे सभी ऋषि कह गये हैं उस परमसत्ता का निवास अपने शरीर के भीतर ही है। हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ भी यही बात कहते हैं। अतः अन्तर्मुखी आराधना के बिना काम बन नहीं सकता। यह आराधना भी कोई आसान कार्य नहीं है। वह परमसत्ता ऐसे भयंकर चक्रव्यूह को पार करने पर मिलती है, जिसे पार करना अकेले जीव के लिए बहुत कठिन है। इस रास्ते पर चलने के लिए किसी भेदी संत सत्गुरु की आवश्यकता होती है। भगवान् राम और कृष्ण को भी गुरु धारण करना पड़ा था। इसके अलावा सभी संत, गुरु की महिमा का गुणगान कर गये हैं। अगम लोक का भेद और रास्ता, केवल गुरु कृपा से ही प्राप्त हो सकता है और कोई रास्ता ही नहीं।

      

     संत कबीर ने कहा हैः- "कबीरा धारा अगम की सद्गुरु दई लखाय, उलट ताहि पढ़िये सदा स्वामी संग लगाय।''(राधाकृष्ण) कबीर ने तो यहाँ तक कह दिया''गुरु गोविन्द दोनों खड़े किसके लागूं पांव, बलिहारी गुरुदेव की गोविन्द दियो मिलाय''। संतों ने उस परमसत्ता का स्थान स्पष्ट करते हुए कहा है:-

      

1. ज्यों नैनन में पूतली, त्यों खालिक घट माहिं।

मूरख लोग न जानहीं, बाहर ढूंढन जाहिं।।

2. ज्यों तिल माहीं तेल है, ज्यों चकमक में आग।

तेरा प्रीतम तुझ में, जाग सके तो जाग।।

3. पुष्प मध्य ज्यों वास है, व्याप रहा सब माहिं।।

संतों माहीं पाइये, और कहूँ कुछ नाहिं।।

      

     चेतन गुरु की वाणी में जो प्रभाव और शक्ति होती है, वह छिपी नहीं रह सकती। वही बात एक कथावाचक या उपदेशक बहुत ही अच्छे ढंग से कह सकता है वह बहुत कर्णप्रिय लगेगी, परन्तु उपदेश समाप्त होने के बाद उसका कुछ भी प्रभाव आप पर नहीं बचेगा।

      

     उस बात से, आप में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। परन्तु वही बात 'चेतन गुरु' द्वारा कही जाने पर इतनी प्रभावशाली और गहरी पैठ कर जाती है कि आप जीवन भर उसे भूल नहीं सकते । वह अपके जीवन में जबरदस्त परिवर्तन कर देगी।

      

     एक बार जिज्ञासु बनकर ऐसी सत्संग में चले गये तो फिर बार-बार जाने की इच्छा होगी, जिसे आप रोक नहीं सकेंगे। इस प्रकार आपका जीवन परिवर्तित हो जायेगा, आप द्विज बन जायेंगे। और अगर साधारण व्यक्ति जो अच्छा कथावाचक या उपदेशक हो उसका उपदेश जीवन भर असंख्य बार आप सुनें तो भी आपके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आवेगा। इस सम्बन्ध में कनाडा के टोरन्टो चर्च के पादरी डा. ओ. जे.स्मिथ ने एक जगह लिखा है:- "जब मनुष्य पवित्र आत्मा की शक्ति में से होकर आया हुआ वचन सुनता है तो वातावरण में एक विचित्र रहस्यपूर्ण शक्ति, उपस्थित लोगों को प्रभावित करती है। और जब मनुष्य शारीरिक और दिमागी शक्ति द्वारा दिया हुआ वचन सुनता है तो वह रहस्यपूर्ण विचित्र वातावरण तथा प्रभाव अनुपस्थित रहता है। यदि आप वास्तव में आत्मिक जन है तो इन दोनों के अन्तर को पहचान सकते हैं।" धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों आराधना गहरी होती जायेगी, प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार स्पष्ट होते जायेंगे। इस प्रकार जीव का विश्वास निरन्तर अपनी ही अनुभूतियों के कारण पक्का होता चला जायेगा। ऐसी स्थिति में मनुष्य को प्रार्थाना का सही उत्तर मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। ज्यों-ज्यों रास्ता कटता जायेगा आराधना में आनन्द बढ़ता जायेगा। इस प्रकार जीव एक ही जन्म में परमानन्द की स्थिति में पहुँच जाता है। क्योंकि तामसिक वृत्तियाँ ऐसे जीव के पास से ही नहीं गुजर सकती हैं, अतः ऐसे जीव से सम्पर्क करने वाले लोगों में भी उस सात्विक शक्ति की लहर दौड़ने लगेगी।

      

     इस प्रकार प्रथम आत्म जागृति ही कठिन है। जिस प्रकार एक दीपक के प्रज्वलित होने पर दीपों से दीप जलाने में कोई देर नहीं लगती। इसी प्रकार एक जलता दीपक असंख्य दीपक जला कर संसार का अन्धेरा खत्म कर सकता है। एक चेतन गुरु ही संसार के लिए पर्याप्त है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग