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मेरी प्रत्यक्षानुभूति के अनुसार परम सत्ता तक पहुँचने का रास्ता।

      

     हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ बारम्बार कहते हैं, अपने आपको पहचानो। मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, यह जाने बिना प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार असम्भव है। हमारे धर्म का मूल मंत्र तो 'मैं' आत्मा हूँ, यह विश्वास होना और तदुप बन जाना है। एक मात्र हमारा वैदिक धर्म ही है, जो बारम्बार कहता है, ईश्वर के दर्शन करने होंगे, उसकी प्रत्यक्षानुभूति करनी होगी, तभी मुक्ति संभव है।

      

     इसी संदर्भ में महर्षि अरविन्द ने भी कहा है। ''हिन्दू धर्म का कहना है कि अपने शरीर के, अपने भीतर ही वह पथ है, उस पर चलने के नियम भी दिखा दिये हैं। मैंने उन सब का पालन करना, आरम्भ कर दिया है, एक मास के अन्दर ही अनुभव कर सका हूँ कि हिन्दू धर्म की नियम भी दिखा दिये हैं कि हिन्दू धर्म की बात झूठी नहीं है, जिन-जिन चिह्नों की बात कही गई हैं, मैं उन सब की उपलब्धि कर रहा हूँ, हमारे धर्म के पातंजलि आदि सभी ऋषियों ने कहा है, अगम लोक तक सारा ब्रह्माण्ड हमारे अन्दर है।

      

     "अन्तर्मुखी आराधना के बिना उस परम सत्ता का साक्षात्कार असम्भव है। परन्तु उस पथ पर चलने के लिए 'चेतन पुरुष' का पथ प्रदर्शन और सहारा नितान्त आवश्यक है।'' इसके अभाव में यह यात्रा पूर्ण रूप से असम्भव है। केवल उपदेश कर्म काण्ड, शब्द जाल, प्रदर्शन, तर्कशास्त्र, और अन्ध विश्वास तो अन्धेरे में भटकाने में सहयोगी हैं। किसी भी सत्य की खोज में यह बहिर्मुखी आराधना पूर्ण रूप से असफल हैं। यही कारण है, आज संसार के आम लोगों का विश्वास धर्म से उठ गया है। धार्मिक ढोंग से अधिक परेशान होकर लोगों ने विद्रोही रूप तक धारण कर लिया है। उस परम सत्ता का प्रकाश प्रथम व्यक्ति में होना बहुत कठिन है। एक दीपक के जलने के बाद तो उससे संसार भर में अंसख्य दीपक जलाकर उसे परमसत्ता के प्रकाश से पूरे संसार को जग मगाया जा सकता है। वह प्रथम थर्मल पॉवर हाऊस ही चालू करना कठिन है। मैं इस कार्य को केवल मात्र मानवीय प्रयास से सम्भव नहीं मानता। इस कार्य को सम्पन्न होने में जन्म जन्मान्तरों के कर्मफल, सीधी ईश्वर कृपा और चेतन संत सद्गुरु का आशीर्वाद जरूरी है। दूसरे शब्दों में यह कार्य ईश्वर की स्वयं की शक्ति से ही संभव है। और किसी भी प्रकार यह कार्य संभव नहीं।

      

     हर युग में उसीपरम सत्ता ने स्वयं अवतरित होकर संसार से अन्धकार को भगाया है। महर्षि अरविन्द को भी अलीपुर जेल में सीधा आदेश देकर पथ-प्रदर्शन किया था। श्री अरविन्द ने उस परम सत्ता के साक्षात्कार के सम्बन्ध में लिखा है:-

      

      "मैं अपने निज के लिए कुछ भी नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मुझे अपने लिये न मोक्ष की आवश्यकता है, न अतिमानसिक सिद्धि की। यहाँ मैं इस सिद्धि के लिये जो यत्न कर रहा हूँ, वह केवल इस लिये कि पार्थिव चेतना में इस काम का होना आवश्यक है और यदि यह पहले मेरे अन्दर न हुआ तो औरों में भी न हो सकेगा।

      

     उपर्युक्त बातों से स्पष्ट होता है कि प्रथम चेतना ही कठिन है। उस परम सत्ता की चेतना का सीधा अर्थ होता है, उस परम शक्ति का अवतरण। मैं पहले ही स्पष्ट कह चुका हूँ कि मेरे अन्दर जो परिवर्तन आया और आज मेरे माध्यम से जो कुछ करवाया जा रहा है, उसमें मेरा स्वयं का रत्ती भर भी प्रयास नहीं रहा है। इस प्रकार मैं देख रहा हूँ, मेरी तनिक भी इच्छा नहीं थी, फिर भी उस परमसत्ता ने मुझे माध्यम बनाकर अपनी मर्जी से चलाना प्रारम्भ कर दिया। जो थोड़ी कमी थी, वह कार्य मेरे संत सद्गुरु जो कि उस परमसत्ता के अवतार थे, के आशीर्वाद से पूर्ण कर दिया। इस प्रकार मुझे स्पष्ट बता दिया गया है कि मेरे माध्यम से जो शक्ति प्रकट हो रही है, वह ईश्वर कृपा और मेरे संत सद्गुरुदेव के आशीर्वाद का फल है। शुद्ध ज्ञान के क्षेत्र ब्रह्मलोक और सहस्रदलकंवल तक का आरोहण मेरे अनेक जन्मों की आराधना का फल हैं, परन्तु सत् लोक, अलख लोक और अगम लोक का आरोहण गुरु कृपा के बिना असम्भव था।

      

     'नाम अमल' या 'नाम खमारी का आनन्द अगम लोक से आता है। अतः मेरे माध्यम से जो सच्ची शान्ति और सच्चा आनन्द, जिसे संतों ने नाम खुमारी या नाम अमल की संज्ञा दी हैं, लोगों को प्राप्त हो रहा है, वह मात्र ईश्वर कृपा और गुरुदेव के आशीर्वाद से ही सम्भव हो सका।

      

     यह कार्य मानवीय प्रयास से सम्भव नहीं था। मुझे मूलाधार से सहस्रदलकंवल तक की यात्रा में कोई विशेष कष्ट नहीं हुआ और आगे का असम्भव आरोहण गुरु कृपा से अनायास ही हो गया। इस प्रकार मैं देखता हूँ कि मैंने इच्छा शक्ति से प्रेरित होकर इस जन्म में कुछ नहीं किया।अतः जो कुछ मैं बाँटने निकला हूँ, उसमें मेरा कुछ भी नहीं है।

      

      मेरे गुरुदेव के आशीर्वाद और ईश्वर कृपा से जो सात्विक धन मिला है, वही बाँटने संसार में निकल पड़ा हूँ। इस समय मुझे दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। मेरे परिवार के प्रति अभी काफी जिम्मेदारियाँ है। परमार्थ के कार्य के साथ इन जिम्मेदारियों को निभाने का भी स्पष्ट आदेश है। मुझे स्पष्ट बता दिया गया है कि जब तक परिवार का कर्ज पूरा न चुका सकें, उनसे विमुख होने का अर्थ होगा, योग भ्रष्ट होना। हमारे वेदों में वर्णित उस प्रकाश प्रद शब्द से ही यह पूर्ण आरोहण सम्भव हो सका। मैं देख रहा हूँ-श्री अरविन्द ने जिस चेतना की बात कही है, उसकी सफलता मुझे वेदों में वर्णित 'प्रकाशप्रद शब्द' से ही प्राप्त हुई है।

      

     मैं देख रहा हूँ-मुझसे जुड़ने वाले सभी लोगों को प्रत्येक के कर्मफल के अनुसार मूलाधार से लेकर उस परम सत्ता तक सभी शक्तियों की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार हो रहा है। इस युग में जब कि संसार के आम लोगों का धर्म पर से विश्वास प्रायः उठ चुका है, मेरे जैसे साधारण व्यक्ति के माध्यम से ऐसा होना एक आश्चर्य है।

      

     प्रारम्भ में मुझे खुद को इस पर विश्वास नहीं हुआ, परन्तु उस परमसत्ता के पग-पग पर, पथ प्रदर्शन से मुझे समझने और विश्वास करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। सत्युग को छोड़ कर बाकी युगों में धर्म निरन्तर हासोन्मुख ही रहा। अब अचानक यह परिवर्तन होना स्पष्ट रूप से युग परिवर्तन का संकेत है।

      

     संसार में सात्विक सत्ता के पूर्ण लोप के साथ-साथ तामसिक शक्तियों के मरणासन्न पहुँचने की मुझे जो प्रत्यक्षानुभूति करवाई गई, वह भी इस बात का स्पष्ट संकेत है। पुनः उस परम सत्ता के उदय होने पर संसार में बची-खुची शक्तियाँ समाप्त होने में कोई समय नहीं लगेगा।

      

     मुझे संसार में होने वाले इन परितर्वनों का काफी पहले संकेत मिल चुका था, परन्तु मैं उसे समझ नहीं सका। परन्तु उस परमसत्ता ने जब अपना कार्य प्रारम्भ कर दिया तो धीरे-धीरे मेरे सामने सारी स्थिति स्पष्ट होती चली गई। घटनाक्रम जिस प्रकार करवट ले रहा है, मैं देख रहा हूँ, मुझे अधिक समय तक भारत में नहीं रहने दिया जायेगा।

      

     जीवन कम है और कार्य अधिक। यही कारण है छह वर्ष पहले सेवानिवृत्त होने को मजबूर कर दिया। संसार के आम मानव को यह सब सुनकर विश्वास नहीं हो सकता, परन्तु यह एक सच्चाई है। मैं कुछ दिन इस क्षेत्र में प्रवेश करते हुए भी भागता रहा, परन्तु मुझे जबरदस्ती धकेल दिया गया। धीरे-धीरे झिझक खत्म हो रही है। जब मैंने देख लिया कि जो कुछ करना निश्चित है, उसे तो करना ही पड़ेगा। जो पथ पहले ही दिखा दिया गया था, उस पर चलने में अधिक कठिनाई नहीं हो रही है।

      

     पहले कुछ असम्भव सा लग रहा था, परन्तु पूर्व निर्दिष्ट घटनाएँ आस्वस्त कर रही हैं कि गलत नहीं चल रहा हूँ। मेरे अलावा मेरे से सम्बन्धित लोगों का उन्हीं घटनाओं का पुनरावलोकन इस बात को और सत्यापित कर रहा है। मैं जब विदेशी लोगों से सम्पर्क की बातों पर विचार करता था, तो मुझे सब असम्भव और काल्पनिक लगती थी। परन्तु घटनाक्रम के परिवर्तनों ने ऐसी सभी अनुभूतियों को सही होने का स्पष्ट संकेत दे दिया है। संसार के लोग महर्षि अरविन्द की भविष्यवाणी को जब उनकी कल्पना कहते हैं तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता है।

      

      उन्हें जो स्पष्ट बताया जाता था, वह बात श्री अरविन्द कहते थे। भविष्य के बारे में उन्होंने स्पष्ट कहा हैः- "अगर सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो जाय तो भी मैं उस विनाश के परे नये सृजन की राह देबूंगा। आज संसार में जो कुछ हो रहा है उससे मैं जरा भी नहीं घबराया हुआ हूँ। मैं जानता था कि घटनाएँ ऐसा रूप लेगी। रही बात बौद्धिक आदर्शवादियों की, मैंने उनकी आशाओं को नहीं स्वीकारा, इसलिए मैं निराश भी नहीं होता।'' मुझे जब स्पष्ट आदेश मिलते थे तो बड़ा अचम्भा होता था। कुछ असम्भव और अजीब सा लगता था। परन्तु जब से श्री अरविन्द को पढ़ा, मुझे पक्का विश्वास हो गया कि मैं गलत नहीं हूँ। श्री अरविन्द की इस बात ने मुझे बहुत प्रभावित कियाः

      

     "भगवान की इच्छा है कि भारत सचमुच भारत बने, योरोप की कार्बन कॉपी नहीं। तुम अपने अन्दर समस्त शक्ति के स्त्रोत खोज निकालो, फिर तुम्हारी समस्त क्षेत्रों में विजय-ही-विजय होगी।'' भौतिक विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अगर पूरी शक्ति को सृजन में लगा दिया जाय तो संसार में किसी वस्तु का अभाव नहीं रहेगा। पूरा संसार जब उस सात्विक चेतना से प्रभावित हो जायेगा तो फिर द्वेष, हिंसा, घृणा, और वैरभाव का संसार से अन्त हो जायेगा। इस प्रकार प्रेम, दया, सद्भाव का वातावरण पूरे संसार में हो जायेगा। जो कुछ मुझे बताया जा रहा है, जब वह परिणाम संसार के लोगों को आध्यात्मिक आराधना से प्रत्यक्ष मिलने लगेगा तो पूरा संसार उस परमसत्ता के चुम्बकीय आकर्षण में अनायास ही आ जायेगा। उस समय भगवान् श्रीकृष्ण की वह बात सत्य प्रमाणित हो जायेगी। भगवान ने कहा था - "सब धर्मों को छोड़ कर मेरी शरण में आ जा, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूंगा।"

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग