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संसार का हर प्राणी ईश्वर कृपा का अधिकारी है।

      

     संसार के सभी जीव धारियों में मनुष्य योनि सर्वोत्तम है। मनुष्य योनि के द्वारा ही जीव मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह योनि एक ऐसा संगम है, जहाँ से अगर जीव अच्छे कर्म करता है तो निरन्तर ऊपर उठता हुआ, निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त कर लेता है और यदि इस संगम से मनुष्य बुरे कर्मों द्वारा पतन की ओर बढ़ना प्रारम्भ कर देता है तो फिर उसे चौरासी लाख योनियों के भोग के बाद फिर मनुष्य योनि मिलती है।

      

     इस प्रकार जीव मनुष्य योनि को अगर व्यर्थ में बिता देता है तो समझो कि उसके कर्म फल बहुत बुरे हैं। कर्मों की गति गहन है। ईश्वर के सिवाय इसको समझने की क्षमता किसी में नहीं है। कलियुग में मोक्ष प्राप्ति के दो आसान रास्ते हैं, (1) ईश्वर के नाम का निरन्तर जप करना(2)दान।

      

     इस युग का मानव प्रदर्शन और प्रचार करके अपने आपको सच्चा अध्यात्मवादी समझ रहा है। जब कि यह रास्ता प्रदर्शन का है ही नहीं। ईश्वर के नाम की हमारे संतों ने बहुत महिमा गाई हैं। इस युग में 'नाम' में भारी चमत्कार है। संत कबीरदास जी ने इसकी महिमा करते हुए कहा हैः

      

"नाम अमल उतरै न भाई।

और अमल छिन-छिन चढ़ि उतरै,

नाम अमल दिन बढ़े सवाई।"

      

     संत सत्गुरु नानकदेव जी महाराज ने भी इन्हीं शब्दों में नाम की महिमा गाई है:-

      

भांग धतूरा नानका, उतर जाय प्रभात।।

नाम खुमारी नानका, चढ़ी रहे दिन-रात।

      

     गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा हैः-

      

"कलियुग केवल नाम आधारा, सुमरि सुमरि नर उतरहि पारा"।

      

     इस युग का मानव उपर्युक्त ''नाम खुमारी'' और ''नाम अमल" की बात को केवल अतिशयोक्ति की संज्ञा देकर अपने अल्प ज्ञान पर गौरवान्वित हो रहा है। हमारे धर्म में गुरु का स्थान बहुत ऊँचा माना गया है। गुरु की महिमा का वर्णन करना सम्भव नहीं है। यह लक्ष्य निम्न दोहे से स्पष्ट होता हैः

      

"गुरु गोविन्द दोनों खड़े, किसके लागू पांव।

बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियो मिलाय।।"

      

     उपर्युक्त वाक्य से गुरु पद की गरिमा स्पष्ट झलकती है। मीराबाई ने भी इस सम्बन्ध में कहा है कि ।

      

     "अगर मुझे गुरु गोविन्द दोनों में से एक को चुनने को कहा जाय तो मैं प्रथम गुरु को चुनूंगी। क्योंकि गुरु में गोविन्द से मिलाने की शक्ति है। अगर गुरु को छोड़, गोविन्द को चुनें और यदि देवयोग से गोविन्द से बिछुड़ जाऊँ तो फिर उससे मिलना सम्भव नहीं।'' स्वामी विवेकानन्द जी ने भी इस संदर्भ में कहा है कि "आध्यात्मिक जगत् में गुरु कृपा बिना चलना असम्भव है, परन्तु इस युग में सच्चा गुरु मिलना बहुत कठिन है।

      

     सन् 1967 से लेकर 1982 तक मैं भी यही कहता था कि मेरे और ईश्वर के बीच में गुरु की दलाली की क्या आवश्यकता है? इन 15 सालों में मेरी तिजोरी आध्यात्मिक धन-से ढूंस-ठूस कर भर चुकी थी, परन्तु उसमें से एक पैसा भी निकाल कर खर्च करने की स्थिति में नहीं था। 1983 में ज्यों ही संत सद्गुरुदेव श्री गंगाईनाथ जी महाराज का चरण रज माथे पर लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो काया पलट गई। गुरुदेव ने कृपा करके उस आध्यात्मिक धन से भरी तिजोरी की चाबी मुझे अनायास ही सौंप दी। मैं इस स्थिति से ऐसा चकाचौंध हो गया कि समझ ही नहीं पा रहा था कि इस अपार धन का कैसे सदुपयोग करूं?

      

     मैं अभी संभल ही नहीं पाया था कि 31.12.1983 की क्रूर काल रात्रि ने उस महान् आत्मा को भौतिक रूप से छीन लिया। इसके बाद करीब दो साल (अगस्त 1985) तक मैं अपनी सुध-बुद्ध खोये पागल की तरह से भटकता रहा।

      

     23-8-83 से 6-8-85 तक मैं बिना किसी भौतिक कारण के अपनी नौकरी से अनुपस्थित रहा। इसके बाद नौकरी पर उपस्थित हुआ। जामसर जाकर समाधि पर पूजा अर्चना की तो दूसरी ही दुनिया में पहुँच गया। धीरे-धीरे जब शान्त हुआ तो यह देख कर चकित रह गया कि गुरुदेव अनायास ही अपनी असंख्य पीढ़ियों की अथाह आध्यात्मिक धन राशि मेरे नाम वसीयत कर गये। मैं आज भी नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरे पास कितना आध्यात्मिक धन है और इसका कैसे उपयोग करूँ? परन्तु एक बात से, मैं आस्वस्त हूँ कि आज भी पग-पग पर मुझे गुरुदेव पथ प्रदर्शित करते हैं।

      

     गुरु कृपा से मेरे साथ आध्यात्मिक सम्बन्ध जोड़ने वाले लोगों को "नाम खुमारी" और "नाम अमल" का आनन्द आने लगता है। मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है। यह गुरुदेव के आशीर्वाद और ईश्वर कृपा से हो रहा है।

      

     मुझे इस संबंध में कोई भ्रम नहीं है। मैं अच्छी प्रकार समझ रहा हूँ कि यह शक्ति असंख्य गुरुओं द्वारा संचित की हुई हैं, जो कि अनायास ही मुझे गुरुदेव द्वारा वसीयत में मिल गई। गुरु कृपा की महिमा करने को, न मेरे पास भाव है, और न ही शब्द। अतः उसका वर्णन करना कम से कम मेरे वश की तो बात नहीं है।

      

     इस युग में दूसरा मोक्ष प्राप्ति का रास्ता दान है। हमारे संतों ने कहा है ‘‘कलियुग में दान ही एक मात्र धर्म है। तप और कठिन योगों की साधना इस युग में नहीं होती।

      

     दान की व्याख्या करते समय हमारे संतों ने कहा है कि सब दानों में श्रेष्ठ-धर्म दान (अध्यात्म दान) है। फिर विद्या दान और इसके बाद प्राण दान। भोजन और वस्त्र का दान सबसे हल्का दान है''।

      

     इसी संदर्भ में व्यास जी ने भी कहा है कि "आध्यात्मिक ज्ञान दान ही सर्वोत्तम दान है।'' उपर्युक्त तथ्यों से प्रभावित होकर मेरे गुरुओं द्वारा अर्जित विपुल आध्यात्मिक ज्ञान दान के लिए संसार में निकल पड़ा हूँ। मेरा अपना इस में कुछ नहीं है। जो कुछ भी बाढूँगा उसका फल तो उन्हीं पुण्यात्माओं को मिलेगा। मैं तो मात्र उनका सेवक हूँ। अतः मैं तो इस काम की मजदूरी मात्र लेने का हकदार हूँ।

      

     ईश्वर का कोई ठेकेदार नहीं, वही सब का ठेकेदार है। अतः संसार में इस समय जो वर्ग, मात्र अपने आपको इसका अधिकारी मानता है वह संसार के प्राणियों को गुमराह कर रहा है। इस सम्बन्ध में वात्स्यायन ने स्पष्ट कहा हैः- "जिसने यथाविहित धर्म की अनुभूति की है, वह म्लेच्छ होने पर भी ऋषि हो सकता है। इसी लिए प्राचीन काल में वेश्या पुत्र वशिष्ठ, धीवर तनमय (मछुआरी पुत्र )व्यास, दासी सुत नारद आदि प्रभृति ऋषि कहलाये थे।''

      

     वाल्मिकी, रैदास और कबीर आदि अनेक संतों ने यह प्रमाणित कर दिया है कि "जाति पांति पूछे न कोई, हरि को भजै सो हरि को होई।" अब वह समय दूर नहीं है जब तम के घोर अन्धकार को चीरता हुआ धर्म का सूर्य उदय होगा और संसार से तामसिकता को पूर्ण रूप से नष्ट कर देगा। इस प्रकार श्री अरविन्द के शब्दों में "धरा पर स्वर्ग उतर आवेगा।"

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग