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मोक्ष की प्राप्ति केवल कृष्ण उपासना से ही सम्भव है।

      

     मनुष्य योनि, प्राणधारियों में सर्वोत्तम योनि है। मनुष्य शरीर, ईश्वर का सर्वोत्तम स्वरूप है। केवल इसी योनि में ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है और इसके बिना मोक्ष असम्भव है। केवल मोक्ष ही जीवन का आखिरी उद्देश्य है। भगवान् श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि यह मनुष्य शरीर सुखरहित क्षण भंगुर है। केवल ईश्वर प्राप्ति से ही मोक्ष और परमानन्द की प्राप्ति संभव है। इस सम्बन्ध में भगवान् ने गीता के नौवें अध्याय के 32वें और 33वें श्लोक में साफ कहा है :-

      

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।      

स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्॥9:32॥      

किं पुनर्बाह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।      

अनित्यमसुख लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥9:33॥

      

     क्योंकि हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य शुद्रादिक तथा पापयोनि वाले भी जो कोई होवें, वे भी मेरे शरणागत हो कर परमगति को प्राप्त होते हैं, फिर क्या कहना है। पुण्य शील ब्राह्मणजन तथा राजर्षि भक्तजन (परमगति को )प्राप्त होते हैं, इसलिए सुख रहित क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर मेरा ही भजन कर। परन्तु हम देख रहे हैं, भगवान् ने गीता में सारी स्थिति स्पष्ट कर दी है फिर भी संसार का मानव भ्रमित हुआ, अविश्वासी नस्तिकों की तरह भटक रहा है। या फिर छोटे-छोटे देवताओं तथा प्रेतों के सामने नतमस्तक हुआ, भयंकर कष्ट भोगते हुए नष्ट होकर अधोगति को प्राप्त हो रहा है। एक तो कलियुग के कारण संसार में पूर्ण रूप से तामसिक शक्तियों का साम्राज्य और फिर ऐसी स्थिति में त्रिगुणमयी, योगमाया के चक्कर से निकलना, इस युग में बड़ा कठिन है। केवल भगवान् की अनन्य शरण से ही काम बनना सम्भव है। इस सम्बन्ध में भगवान् ने सातवें अध्याय के 14वें श्लोक में स्पष्ट कहा है :-

      

दैवी ह्योषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।      

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥7:14॥

      

     क्योंकि यह अलौकिक त्रिगुणमयी मेरी योगमाया बड़ी दुस्तर है, जो पुरुष मेरे को ही निरन्तर भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में इस युग में प्रचलित आराधनाओं से मोक्ष प्राप्त करना असमर्थ है। संसार के सभी प्राणी त्रिगुणमयी माया के क्षेत्र की शक्तियों को ही मोक्ष देने वाली सत्ता समझ कर, उनके चक्कर में भ्रमित हो रहे हैं। इस सम्बन्ध में गीता के आठवें अध्याय के 16वें श्लोक में स्थिति को स्पष्ट करते हुए भगवान् ने कहा हैं :-

      

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।      

मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥16॥

      

      हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक से लेकर सब लोक पुनरावर्ती स्वभाव वाले हैं।, परन्तु हे कुन्ती पुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता है। इस पर भी काल के गुण धर्म के कारण लोगों की मति ऐसी भ्रमित हो रही है कि जन्म मरण के चक्कर में डालने वाली शक्तियों से ही लोग मोक्ष की उम्मीद कर रहे हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के अठारहवें अध्याय के 66वें श्लोक में साफ कहा है :-

      

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।      

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। 18:66॥

      

     सब धर्मों को त्यागकर केवल एक मुझ परमात्मा की शरण को प्राप्त हो। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर। इसके बावजूद संसार के प्राणी उस सनातन सत्ता को छोड़ माया की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। संसार में तामसिक वृत्तियों का एक छत्र साम्राज्य स्थापित हो चुका है।

      

     भारत में तो यह अन्धकार सर्वाधिक ठोस बनकर जम चुका है। जब आध्यात्मिक गुरु, भौतिक विज्ञान की सच्चाई के विरुद्ध प्रचार करते हैं। तो मुझे भारी दुःख होता है। ऐसे ढोंगी लोग अपना जीवन तो बिगाड़ ही रहे हैं, भोलेभाले लोगों को धर्म की आड़ में भारी संकट में डालकर, भारी पाप के भागी बन रहे हैं।

      

     ऐसी स्थिति में अगर भारत के हिन्दू कितना ही प्रयास करें, संसार के लोगों को प्रभावित नहीं कर सकेंगे। भारत में इस समय न धर्म बचा है, न सच्चाई और ईमानदारी बची है और न ही राष्ट्रीयता। जब तक हम इस कटु सत्य को स्वीकार करके, बीमारी का इलाज नहीं खोजेंगे, हमारा कल्याण असम्भव है। तिलक-छापे करने, कपड़े रंगने, तन रंगने से काम चलने वाला नहीं है। यह रोग तो मन रंगने से ही ठीक होगा। क्योंकि यह ही सारा प्रपंच हम से करवा रहा हैं। मीरा बाई ने ठीक ही कहा है "अपने ही रंग में रंग दे चुनरिया।"

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग