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शक्ति के अवतरण के खतरों से 'गुरु''रक्षा करता है।

      

     श्री अरविन्द द्वारा मार्च, 1928 में लिखा लेख-''ऊपर से होने वाले अवतरण तथा उसे क्रियान्वित करने की इस प्रक्रिया में सबसे प्रधान बात है, स्वयं अपने ऊपर पूर्ण रूप से निर्भर न करना, बल्कि पथप्रदर्शन पर निर्भर करना और जो कुछ घटित हो उस पर विचार करने, मत देने और निर्णय करने के लिए उन्हें बतलाना (यह कार्य गुरु के साथ आंतरिक पथ प्रदर्शन से किया जा सकता है )। क्योंकि प्रायः ऐसा ही होता है कि 'अवतरण के कारण निम्नतर प्रकृति की शक्तियाँ जाग्रत और उत्तेजित हो जाती है (क्योंकि उन्हें उनका अधिकार क्षेत्र छिनता नजर आता है) और उसके साथ मिल जाना तथा उसे अपने लिए उपयोगी बनाना चाहती है। प्रायः ही ऐसा होता है कि स्वभावतः अदिव्य कोई शक्ति या कई शक्तियाँ ‘परमेश्वर' या भगवती माता के रूप में सामने प्रकट होती है और हमारी सत्ता से सेवा और समर्पण की माँग करती है। अगर इन्हें स्वीकार किया जाए तो इसका अत्यन्त सर्वनाशी परिणाम होगा।

      

     अवश्य ही, यदि साधक केवल 'भागवत' क्रिया की अवस्था तक ऊपर उठा हुआ हो और उसी पथ प्रदर्शक के प्रति उसने 'आत्मदान' और 'समर्पण' किया हो तो सब कार्य आसानी से चल सकता है। साधक का यह आरोहण तथा समस्त अहंकार पूर्ण शक्तियों या अहंकार को अच्छी लगने वाली शक्तियों का त्याग पूरी साधना के भीतर हमारी रक्षा करता है। परन्तु प्रकृति के रास्ते जालों से भरे हैं,

      

      'अहंकार' के छद्मवेश अंसख्य हैं, अन्धकार की शक्तियों की माया- राक्षसी माया-असाधारण चातुरी से भरी है, हमारी बुद्धि अयोग्य पथ प्रदर्शक है, और प्रायः ही विश्वासघात करती है, प्राणगत कामना सदा हमारे साथ रहकर हमें किसी आकर्षक पुकार का अनुसरण करने का लोभ देती रहती है।

      

     

      - समर्थ सद्गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग