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मैं न्यूटन की आखिरी इच्छा को पूर्ण करने आया हूँ।
13 जनवरी 1991
गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग
एवीएसके, जोधपुर के संस्थापक और संरक्षक
मैं जब अपने पूरे जीवन पर नजर डालता हूँ तो पाता हूँ कि मैं एक अबोध बालक की तरह समुद्र के किनारे सीपियाँ, समुद्री घोंघों की हड्डियाँ ही चुनता रहा। अब मैं अन्तिम समय में जब उस विशाल समुद्र को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि मैं ने कुछ भी नहीं प्राप्त किया। इस विशाल समुद्र की खोज से ही शान्ति सम्भव होगी।

- न्यूटन

  • यही नहीं, मैं उन्हें उस तत्व की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार करवाने आया हूँ जिसकी खोज हमारे ऋषि-मुनियों ने की थी। उन्होंने इस भौतिक सूर्य जैसे लाखों सूर्य देखे । इसके अतिरिक्त उन्होंने देखा कि एक ऐसा उर्जा का पुन्ज है जो इन लाखों सूर्यों को प्रकाशित कर रहा था। उन्होंने उस तत्व का जो ज्ञान प्राप्त किया मैं उसकी प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार कराने संसार में निकला हूँ।

  • यह ज्ञान मुझे मेरे संत सद्गुरुदेव बाबा श्री गंगाईनाथ जी महाराज की अहेतु की कृपा के कारण ही प्राप्त हुआ है अतः मैं इसे गुरु प्रसाद की संज्ञा देता हूँ।

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