शक्तिपात दीक्षा

शक्तिपात दीक्षा में गुरु अपनी शक्ति से साधक की ‘कुण्डलिनी’ को जाग्रत करता है।

सभी प्रकार की दीक्षाओं में “शक्तिपात – दीक्षा” सर्वोत्तम होती है।

गुरु-शिष्य परम्परा में दीक्षा का एक विधान है। सभी प्रकार की दीक्षाओं में “शक्तिपात – दीक्षा” सर्वोत्तम होती है।

इसमें गुरु अपनी इच्छा से, चार प्रकार से शिष्य की शक्ति (कुण्डलिनी ) को चेतन करके सक्रिय करता है:

  • स्पर्श से
  • दृष्टि मात्र से
  • शब्द (मंत्र) से
  • संकल्प मात्र से भी

शक्तिपात दीक्षा गुरुदेव सियाग द्वारा समझाया गया

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सिद्धयोग अर्थात् महायोग में शक्तिपात-दीक्षा द्वारा गुरु अपनी शक्ति से शिष्य की कुण्डलिनी को जाग्रत करता है। गुरु की व्याख्या करते हुए कहा गया है- “वह शिष्यों को उनके अन्तर में प्रभावी किन्तु सुप्त शक्ति (कुण्डलिनी ) को जाग्रत करता है और साधक को उस परमसत्य से साक्षात्कार-योग्य बनाता है।

  • स्पर्श दीक्षा
    इसमें गुरु अपनी शक्ति; शिष्य में तीन स्थानों – भूमध्य में अर्थात् आज्ञा-चक्र में, दूसरा हृदय, तीसरा मेरूदण्ड के नीचे मूलाधार पर स्पर्श करके प्रवाहित करता है।

  • मंत्र दीक्षा
    गुरु की शक्ति, शिष्य में मंत्र के द्वारा प्रवाहित होती है। ‘गुरु’ जिस मंत्र की दीक्षा देता है, उसे उसने लम्बे समय तक जपा हुआ होता है। मंत्र शक्ति को आत्मसात किया हुआ होता है। उस मंत्र में और गुरु में कोई अन्तर नहीं रहता । गुरु का सम्पूर्ण शरीर मंत्रमय बन जाता है, ऐसे चेतन मंत्र की, गुरु जब दीक्षा देता है, वही मुक्ति देता है।

गुरुदेव सियाग संजीवनी मंत्र द्वारा साधक को शक्तिपात दीक्षा देते हैं।
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  • दृष्टि (हक-दीक्षा)
    अर्थात् मात्र दृष्टि द्वारा दी जाने वाली दीक्षा। ऐसी दीक्षा देने वाले गुरु की दृष्टि, “अन्तर-लक्षी’ होती है। यह दीक्षा वही गुरु दे सकता है, जिसने सद्गुरु से दीक्षा ली हुई हो, और जो स्वयं भी अन्तर लक्षी हो। अन्यथा यह दीक्षा देना पूर्ण रूप से असम्भव है।

  • मानस (संकल्प-दीक्षा)
    जिसमें गुरु से दीक्षा लेने का मानस बनाने मात्र से ही दीक्षा मिल जाती हैं। इस तथ्य से एकलव्य की प्रतीक-साधना सत्य प्रमाणित होती है। परन्तु ऐसे शिष्य बहुत कम होते हैं।

"यावत्सा निद्रिता देहे तावत जीवः पशुर्यथा।
ज्ञानम् न जायते तावत कोटियाग-विधैरपि।"

- स्वामी विष्णु तीर्थ – शक्तिपात

जब तक कुण्डलिनी शरीर में सुषुप्तावस्था में रहेगी, तब तक मनुष्य का व्यवहार ‘पशुवत्’ रहेगा। और वह उस दिव्य-परमसत्ता का ज्ञान पाने में समर्थ नहीं होगा, भले ही वह हजारों प्रकार के यौगिक अभ्यास क्यों न करे।

  • गुरु कृपा रूपी, शक्तिपात दीक्षा से जब कुण्डलिनी जाग्रत होती है, तब क्या होता है?

    जब गुरुकृपा से सुप्त कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, तब सभी चक्रों और ग्रन्थियों का (ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रूद्रग्रन्थि ) भेदन होता है। इस प्रकार साधक समाधि स्थिति, जो कि समत्त्व बोध की स्थिति है, प्राप्त कर लेता है। शक्तिपात होते ही साधक को प्रारब्ध कर्मों के अनुसार विभिन्न प्रकार की यौगिक क्रियाएँ (आसन, बन्ध, मुद्राएँ एवं प्राणायाम ) स्वतः ही होने लगती हैं। शिष्य में जाग्रत हुई शक्ति (कुण्डलिनी) पर गुरु का पूर्ण प्रभुत्व रहता है, जिससे वह उसके वेग को नियन्त्रित और अनुशासित करता है।

    कुण्डलिनी को हमारे शास्त्रों में ‘जगत् जननी’ कहा है। वह उस परमसत्ता का दिव्य प्रकाश है, जो सर्वज्ञ है, सर्वत्र है, सर्वशक्तिमान है। अतः जिस साधक की कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है, उसे अनिश्चितकाल तक के भूत-भविष्य एवं वर्तमान काल की प्रत्यक्षानुभूति एवं साक्षात्कार होने लगता है। हमारे शास्त्रों के अनुसार जब तक मुनष्य की कुण्डलिनी जाग्रत होकर सहस्रार तक नहीं पहुंचती, ‘मुक्ति’ नहीं मिलती। पृथ्वी तत्व का आकाश तत्व से मिलन ही ‘मोक्ष’ है, कैवल्यपद की प्राप्ति है।

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