गुरुदेव की दिव्य लेखनी

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01. आखिर हमें गुरु की आवश्यकता क्यों?

जब प्राणी संसार में जन्म लेता है तो वह सांसारिक ज्ञान से पूर्ण रूप से अनभिज्ञ होता है। वह सर्वप्रथम अपने माता पिता से भौतिक जगत् का ज्ञान प्राप्त करता है, उसके प्रथम गुरु उसके माता पिता होते हैं।

02. मेरे आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ

मैं, मानव की एक मात्र सत्ता में ही विश्वास रखता था, क्योंकि प्रारम्भ से ही मैं, नौकरी में मजदूर संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में आ गया था। अतः मेरा झुकाव राजनीति की तरफ अधिक होता गया। मेरा मूल रूप से यह स्वभाव रहा है कि मैं अपनी मान्यताओं पर हमेशा अडिग रहता हूँं।

03. नाम खुमारी एक सच्चाई है

मैं देख रहा हूँ, इस युग के मानव जब कबीर और नानक की ‘नाम अमल’ और ‘नाम खुमारी’ की बात सुनते हैं, या पढ़ते हैं तो उन्हें इस बात पर बिल्कुल ही विश्वास नहीं होता। अपने ज्ञान के अनुसार वे इस बात को ईश्वर के लिए श्रद्धा से काम में लिए हुए अतिशयोक्ति अलंकार के अतिरिक्त कुछ भी मानने को तैयार नहीं।

04. मोक्ष की प्राप्ति केवल कृष्ण उपासना से ही सम्भव है

मनुष्य योनि, प्राणधारियों में सर्वोत्तम योनि है। मनुष्य शरीर, ईश्वर का सर्वोत्तम स्वरूप है। केवल इसी योनि में ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है और इसके बिना मोक्ष असम्भव है।

05. आराधना का जवाब क्यों नहीं मिलता?

इस प्रकार प्रथम आत्म जागृति ही कठिन है। जिस प्रकार एक दीपक के प्रज्वलित होने पर दीपों से दीप जलाने में कोई देर नहीं लगती। इसी प्रकार एक जलता दीपक असंख्य दीपक जला कर संसार का अन्धेरा खत्म कर सकता है। एक चेतन गुरु ही संसार के लिए पर्याप्त है।

06. भारत का भविष्य

भारत सदियों तक गुलाम रहा, इसलिए इस पवित्र भूमि पर अंधकार ठोस बनकर जम गया है। वैदान्तियों को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व के धर्मों के अनुयाइयों का विकास अभी द्वैत भाव तक ही हुआ है।

07. "मंत्र शक्ति" पर इस युग के मानव का विश्वास क्यों खत्म हुआ ?

शब्द की उत्पति मात्र उस परम सत्ता की देन है। हर अक्षर किसी न किसी शक्ति का स्वरूप है। सारी शक्तियाँ मनुष्य के शरीर में स्थित हैं। हर शक्ति का उपयुक्त स्थान है।

08. शक्तिपात दीक्षा क्या है ?

गुरु-शिष्य परम्परा में दीक्षा का, एक विधान है। सभी प्रकार की दीक्षाओं में “शक्तिपात – दीक्षा” सर्वोत्तम होती है। इसमें गुरु अपनी इच्छा से, चार प्रकार से शिष्य की शक्ति (कुण्डलिनी ) को चेतन करके सक्रिय करता है- 1) स्पर्श से 2) दृष्टि मात्र से 3) शब्द (मंत्र) से 4) संकल्प मात्र से भी.

09. यह सम्पूर्ण संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है

भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के 10 वें अध्याय के 39 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है: यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥10:39॥

10. भारत में आध्यात्मिक जागृति

इस समय भारत में आध्यात्मिक जगत् में पूर्ण रूप से अन्धकार है। जब तक भारत का आम नागरिक अपनी इस कमजोरी को दिल से स्वीकार करके दूर करने का सामूहिक प्रयास प्रारम्भ नहीं करता है, यह भयंकर अन्धकार मिटने वाला नहीं है।.

11. आध्यात्मिक जीवन का मतलब भौतिक संसार से विरक्ति नहीं

इस युग में आध्यात्मिक जीवन की व्याख्या बड़े विचित्र ढंग से की गई है। इन मन घड़न्त और कृत्रिम जीवन मान्यताओं के कारण ही इस युग का मानव अध्यात्मवाद को निरर्थक और कोरा ढोंग मानता है। यही कारण है कि इस युग में धर्म का अधिक ह्रास हुआ है।

12. आध्यात्मिक चेतना कैसे फैलती है ?

आध्यात्मिक चेतना ईश्वरीय शक्ति के प्रयास से फैलती है। इसमें मानवीय बुद्धि द्वारा किया गया प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता। मानवीय प्रयास को अधिक से अधिक वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित प्रचार से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

13. इस युग के धर्माचार्य क्या हैं? -धर्मगुरु, इतिहास व्याख्याता या चारण-भाट?

इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्यों की एक जैसी ही स्थिति है। सभी लोग पहले के अवतारों, पैगम्बरों और संतों का गुणगान करते हैं।

14. संजीवनी मंत्र

ये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपनी चेतन और अचेतन वस्तुओं सहित एक दिव्य शब्द से बना है।

दुनियां के सभी धर्मों में कितनी भी विभिन्नताएं हों पर एक बात पर सभी एकमत हैं कि इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक दिव्य शब्द से हुई है।

15. शर्म, संकोच और हठधर्मिता की आखिर नहीं चल सकी।

मैं प्रारम्भ में ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि मैंने कभी किसी धार्मिक ग्रन्थ का अध्ययन नहीं किया। मुझे जो कुछ भी प्राप्त हुआ, उसमें किसी प्रकार का मानवीय प्रयास या बुद्धि का लेशमात्र भी सहयोग नहीं रहा।

16. मोक्ष क्या है? उसको प्राप्त करना क्यों जरूरी है?

हम देख रहे हैं कि संसार की हर वस्तु नाशवान है। हमारे सभी संत कह गये हैं- वह अजर अमर है। उसकी प्राप्ति के बिना परम शान्ति असम्भव है।

17. आध्यात्मिक-ज्ञान प्राप्ति का समय भी युवावस्था

मनुष्य जीवन में क्रमिक विकास के अनुसार ही कार्य करने के नियम निर्धारित किये गये हैं। शारीरिक और बौद्धिक विकास को ध्यान में रखते हुए सम्पूर्ण जीवन को चार भागों में बाँटा है बह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

18. सेंट जाॅन के प्रकाशित वाक्य

'बाइबल का यह आखिरी हिस्सा वास्तव में बाइबल का प्राण है। सेंट जाॅन एक बहुत बड़े महान् संत थे। वे यीशु के मुक्तिदाता सद्गुरु थे। जिस प्रकार हमारा इतिहास बताता है कि भगवान् श्री राम और श्रीकृष्ण को भी गुरु धारण करने पड़े थे।

19. संसार का हर प्राणी ईश्वर कृपा का अधिकारी है।

संसार के सभी जीव धारियों में मनुष्य योनि सर्वोत्तम है। मनुष्य योनि के द्वारा ही जीव मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह योनि एक ऐसा संगम है, जहाँ से अगर जीव अच्छे कर्म करता है तो निरन्तर ऊपर उठता हुआ, निश्चित रूप से मोक्ष प्राप्त कर लेता है और यदि इस संगम से मनुष्य बुरे कर्मों द्वारा पतन की ओर बढ़ना प्रारम्भ कर देता है तो फिर उसे चौरासी लाख योनियों के भोग के बाद फिर मनुष्य योनि मिलती है।

20. गुरु क्या है?

हमारे धर्मशास्त्रों में ‘गुरु’ की बहुत महिमा गाई गई है। गुरु का पद ईश्वर से भी बड़ा माना गया है।

21. पूर्वजन्म और पूर्वाभास का सत्यापन सम्भव है।

अगर मनुष्य सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी है तो उसका सीधा सम्पर्क अपने ही शरीर स्थित आत्मा और परमात्मा तत्त्व से है। यह तत्त्व ही संसार के सर्वभूतों के कारण हैं।

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