गुरुदेव की दिव्य लेखनी

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मेरे आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ

मैं, मानव की एक मात्र सत्ता में ही विश्वास रखता था, क्योंकि प्रारम्भ से ही मैं, नौकरी में मजदूर संगठन में काम करने वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में आ गया था। अतः मेरा झुकाव राजनीति की तरफ अधिक होता गया। मेरा मूल रूप से यह स्वभाव रहा है कि मैं अपनी मान्यताओं पर हमेशा अडिग रहता हूँं।

नाम खुमारी एक सच्चाई है

मैं देख रहा हूँ, इस युग के मानव जब कबीर और नानक की ‘नाम अमल’ और ‘नाम खुमारी’ की बात सुनते हैं, या पढ़ते हैं तो उन्हें इस बात पर बिल्कुल ही विश्वास नहीं होता। अपने ज्ञान के अनुसार वे इस बात को ईश्वर के लिए श्रद्धा से काम में लिए हुए अतिशयोक्ति अलंकार के अतिरिक्त कुछ भी मानने को तैयार नहीं।

मोक्ष की प्राप्ति केवल कृष्ण उपासना से ही सम्भव है

मनुष्य योनि, प्राणधारियों में सर्वोत्तम योनि है। मनुष्य शरीर, ईश्वर का सर्वोत्तम स्वरूप है। केवल इसी योनि में ईश्वर की प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार संभव है और इसके बिना मोक्ष असम्भव है।

आराधना का जवाब क्यों नहीं मिलता?

इस प्रकार प्रथम आत्म जागृति ही कठिन है। जिस प्रकार एक दीपक के प्रज्वलित होने पर दीपों से दीप जलाने में कोई देर नहीं लगती। इसी प्रकार एक जलता दीपक असंख्य दीपक जला कर संसार का अन्धेरा खत्म कर सकता है। एक चेतन गुरु ही संसार के लिए पर्याप्त है।

भारत का भविष्य

भारत सदियों तक गुलाम रहा, इसलिए इस पवित्र भूमि पर अंधकार ठोस बनकर जम गया है। वैदान्तियों को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व के धर्मों के अनुयाइयों का विकास अभी द्वैत भाव तक ही हुआ है।

"मंत्र शक्ति" पर इस युग के मानव का विश्वास क्यों खत्म हुआ ?

शब्द की उत्पति मात्र उस परम सत्ता की देन है। हर अक्षर किसी न किसी शक्ति का स्वरूप है। सारी शक्तियाँ मनुष्य के शरीर में स्थित हैं। हर शक्ति का उपयुक्त स्थान है।

शक्तिपात दीक्षा क्या है ?

गुरु-शिष्य परम्परा में दीक्षा का, एक विधान है। सभी प्रकार की दीक्षाओं में “शक्तिपात – दीक्षा” सर्वोत्तम होती है। इसमें गुरु अपनी इच्छा से, चार प्रकार से शिष्य की शक्ति (कुण्डलिनी ) को चेतन करके सक्रिय करता है- 1) स्पर्श से 2) दृष्टि मात्र से 3) शब्द (मंत्र) से 4) संकल्प मात्र से भी.

यह सम्पूर्ण संसार एक ही परमसत्ता का विस्तृत स्वरूप है

भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के 10 वें अध्याय के 39 वें श्लोक में स्पष्ट कहा है: यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्॥10:39॥

भारत में आध्यात्मिक जागृति

इस समय भारत में आध्यात्मिक जगत् में पूर्ण रूप से अन्धकार है। जब तक भारत का आम नागरिक अपनी इस कमजोरी को दिल से स्वीकार करके दूर करने का सामूहिक प्रयास प्रारम्भ नहीं करता है, यह भयंकर अन्धकार मिटने वाला नहीं है।.

आध्यात्मिक जीवन का मतलब भौतिक संसार से विरक्ति नहीं

इस युग में आध्यात्मिक जीवन की व्याख्या बड़े विचित्र ढंग से की गई है। इन मन घड़न्त और कृत्रिम जीवन मान्यताओं के कारण ही इस युग का मानव अध्यात्मवाद को निरर्थक और कोरा ढोंग मानता है। यही कारण है कि इस युग में धर्म का अधिक ह्रास हुआ है।

आध्यात्मिक चेतना कैसे फैलती है ?

आध्यात्मिक चेतना ईश्वरीय शक्ति के प्रयास से फैलती है। इसमें मानवीय बुद्धि द्वारा किया गया प्रयास सार्थक सिद्ध नहीं हो सकता। मानवीय प्रयास को अधिक से अधिक वैज्ञानिक उपकरणों से सुसज्जित प्रचार से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

गुरु कौन है ?

हमारे धर्मशास्त्रों में ‘गुरु’ की बहुत महिमा गाई गई है। गुरु का पद ईश्वर से भी बड़ा माना गया है।

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