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इस युग के धर्माचार्य क्या हैं? -धर्मगुरु, इतिहास व्याख्याता या चारण-भाट?
मई 08, 1988
गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग
एवीएसके, जोधपुर के संस्थापक और संरक्षक

इस समय संसार भर के सभी धर्मों के धर्माचार्यों की एक जैसी ही स्थिति है। सभी लोग पहले के अवतारों, पैगम्बरों और संतों का गुणगान करते हैं। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों का शोध करते हैं। उनकी अलग-अलग व्याख्या, तर्कबुद्धि और शब्द जाल के सहारे करते हैं।

  • कुछ उन ग्रंथों को नित्य पाठ करने का उपदेश देते हैं। कईयों ने इन्हें कथा के रूप में अपना कर जीविका चलाने का सहारा बना लिया है।

अधिक चतुर लोगों ने प्रतीक के रूप में विभिन्न प्रकार की अनेक मूर्तियाँ बना कर मंदिरों में स्थापित कर ली हैं, और उसको अपनी आजीविका का साधन बना लिया है। प्रायः सभी - पैगम्बरों, अवतारों और संतों का मात्र गुणगान करके अध्यात्म की शिक्षा दे रहे हैं। जिस प्रकार विभिन्न युगों में अनेक संतों ने उस परम सत्ता का साक्षात्कार और प्रत्यक्षानुभूति की है, वह रास्ता कोई नहीं बता रहा है। केवल गुणगान से कुछ भी लाभ होने वाला नहीं है।
  • अगर हम किसी अच्छे खाद्य पदार्थ का केवल गुणगान वर्षों तक करते रहें तो हमें कुछ भी लाभ नहीं होगा। अगर हम बिना गुणगान किए उसे खाना प्रारम्भ कर दें तो निश्चित रूप से उसका प्रभाव हम अपने स्वास्थ्य पर महसूस करने लगेंगे।

  • यही सिद्धान्त जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। इससे भिन्न सभी रास्ते काल्पनिक, भ्रम पैदा करने वाले और भटकाने वाले हैं। दुःख की बात तो यह है कि इस समय संसार के सभी धर्मों में ऐसे लोगों का बोलबाला है। वे सच्चाई की बात सुनने तक को तैयार नहीं।

  • उन्हें भारी भय है कि अगर कहीं ऐसी सच्चाई प्रकट हो गई तो हमारी सत्ता का अन्त हो जायेगा। यही कारण है कि संसार के अधिकतर बुद्धिजीवी लोग, परिणाम के अभाव में उनसे विमुख ही नहीं हो गये, उनके खिलाफ विद्रोह तक करने लगे हैं परन्तु फिर भी वे अपना काम, धन के बल पर अबाधगति से चलाते जा रहे हैं। वे रुक कर अपने अनुयाइयों को दूसरों की बात सुनने का अवसर तक नहीं देना चाहते हैं परन्तु उनका यह भ्रम है। ये यथास्थितिवादी लोग नहीं समझते कि कालचक्र निरन्तर चलता रहता है। उसकी गति में कभी भी व्यवधान नहीं आ सकता। युग परिवर्तन अनादिकाल से होता आया है।

कालचक्र न आजतक कभी प्रभावित हुआ है और न कभी होगा। आदि काल से हिरण्यकश्यप, रावण और कंस होते आये हैं। परन्तु सभी का जो अन्त हुआ, वह सर्व विदित है। झूठ और ढोंग का हमेशा ऐसा ही अन्त होता है। देव और दानव का युद्ध अनादि काल से निरन्तर चलता आ रहा हैं। दानव अपनी शक्ति का ऐसा प्रदर्शन करते है कि ऐसा लगने लगता है, जीत उन्हीं की होगी। परन्तु इतिहास साक्षी है अन्तिम विजय सत्य की ही हुई है। उजाला प्रकट होने पर अन्धेरा तत्काल भाग जाता है। घोर अन्धेरी रात भी सूर्योदय के प्रकाश से जगमगा उठती है।
  • अन्धकार की शक्तियाँ नहीं चाहती कि प्रकाश हो परन्तु सूर्य अबाध गति से उदय हो रहा है, इसी क्रम से युग परिवर्तन होगा। यह पूर्व निश्चित व्यवस्था है। यह परिवर्तन संसार का कोई भी प्राणी रोकने में असमर्थ है। हम देखते हैं अग्रेजों के राज्य में कभी सूर्य अस्त ही नहीं होता था, आज उनके राज्य में सूर्य बहुत कम समय तक दिखाई देता हैं। यह परिवर्तन इसी सदी की देन है। संसार में जो देश उठ रहे हैं, उनकी प्रगति को कोई नहीं रोक सकता।यह ईश्वरीय व्यवस्था है। इसके सम्बन्ध में भारत के ही नहीं, संसार के अनेक संत भविष्यवाणियों कर चुके हैं।

  • इस सम्बन्ध में महर्षि अरविन्द ने स्पष्ट कहा है :- "भारत ही संसार को आध्यात्मिक दान देगा। इसका क्षेत्र सार्वभौम होगा, तथापि केन्द्रीय आन्दोलन भारत ही करेगा।"

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