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चेतन शक्ति से जुड़े बिना, प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार असम्भव है।
8 फ़रवरी 1988
गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग
एवीएसके, जोधपुर के संस्थापक और संरक्षक

चेतन शक्ति से जुड़े बिना, प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार असम्भव है। प्रकाश निर्भयता, नया जोश और चेतनता प्रदान करता है, जबकि अन्धेरा भय, निराशा और अचेतनता का प्रतीक है। दोनों एक दूसरे से विपरीत गुण धर्म की वस्तुएँ हैं। इसीलिए सभी धार्मिक ग्रन्थों में तामसिक शक्तियों की तुलना, अन्धेरे से की गई है और सात्विक शक्तियों की उजाले से।

  • तामसिक शक्तियाँ संसार में हिंसा, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष आदि विनाशकारी शक्तियों का प्रसार-प्रचार करती हैं, जबकि सात्विक शक्तियाँ अहिंसा, प्रेम, दया, सदभाव आदि सृजनात्मक सत्ता का प्रचार-प्रसार करने में निरन्तर लगी रहती हैं।

  • युग के गुण-धर्म की प्रधानता के कारण इस समय संसार में तामसिक शक्तियों का बोलबाला है। सात्विक शक्तियाँ पूर्ण रूप से गौण हो चुकी हैं। मैं कह चुका हूँ कि मुझे परमसत्ता ने जो प्रत्यक्षानुभूति करवाई, उसके अनुसार सात्विकता के पूर्ण ह्रास के साथ-साथ तामसिक सत्ता भी आखिरी सांस ले रही है। उसके बचे खुचे शक्तिहीन वंशज नितान्त निराशा के भाव में डूबे हुए, गिन गिन कर अपने अन्तिम दिन बिता रहे हैं। तामसिक शक्तियों की यह स्थिति स्पष्ट घोषणा करती है कि उस परम सत्ता का संसार में अवतरण हो चुका हैं, ज्यों-ज्यों संसार के सामने उस परम सत्ता के प्रकट होने का समय नजदीक आ रहा है, ये बची-खुची शक्तिहीन तामसिक शक्तियाँ तेज गति से मृत्यु की तरफ बढ़ रही हैं।

  • यीशु और मोहम्मद जो भविष्यवाणियाँ करके गये हैं, उससे इन दोनों धर्मों के धर्माचार्यों में भारी आतंक छाया हुआ हैं। सभी को एक ही चिन्ता खाये जा रही है कि धर्म के नाम पर अरबों खरबों रूपयों का धन, चर्चों और मस्जिदों में आ रहा है, अगर नई शक्ति के प्रकट होने से वह बन्द हो जाता है तो उस पर पलने वाले करोड़ों लोगों का क्या हाल होगा?

हम देखते हैं मृत्यु अवश्यंभावी है, काल चक्र की गति के साथ-साथ, हर वस्तु व्यवस्था, सभ्यता आदि सभी का अन्त सुनिश्चित है। किसी की घबराहट और किसी की खुशी से कालचक्र पूर्ण रूप से अप्रभावित है। युग परिवर्तन के साथ-साथ बहुत विशाल और प्रभावशाली शक्तियाँ हमेशा ही समाप्त होती आ रही हैं। मानवीय व्यवस्था इसे बचाने में पूर्ण रूप से असमर्थ है।

- समर्थ सद्‌गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

  • मानवीय प्रयास मात्र डूबते हुए को तिनके का सहारा ही साबित होगा। जिस परमसत्ता के अवतरण की महर्षि अरविन्द ने घोषणा की है, मेरे जीवन के प्रारम्भ काल से ही वह सत्ता परोक्ष-अपरोक्ष रूप से मेरे इर्द गिर्द अपनी उपस्थिति का भान निरन्तर कराती चली आ रही है। मैं अज्ञानवश कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। मैं भी सांसारिक - जीवों की तरह तामसिक शक्तियों से अत्यधिक प्रभावित था। सन् 1967 में अचानक मुझे लगाम लगा दी गई। उस समय तो मैं कुछ नहीं समझ सका, पर अब अच्छी तरह समझ रहा हूँ कि पहले मैं विपरीत दिशा में चल रहा था, परन्तु एक ही झटके में उसने मेरा मुँह अपनी तरफ घुमा दिया। इस प्रकार मैं निरन्तर उसकी आकर्षण सत्ता के कारण तेज गति से उसकी तरफ बढ़ता गया।

  • इस प्रकार निश्चित समय पर प्रत्यक्षानुभूतियाँ अनायास ही साक्षात्कार में बदल गईं। प्रत्यक्ष आदान-प्रदान के बावजूद गुरु के अभाव में, जो कुछ हो रहा था, उसके बारे में, मैं कुछ भी नहीं समझ सका। ज्यों ही गुरुदेव की चरणरज माथे पर लगी, एक दम काया ही पलट गई। मैं अभी संभल भी नहीं पाया था कि गुरुदेव विरासत में सब सत्ता सौंप कर चल दिये। करीब दो साल तक मुझे कुछ भी होश नहीं रहा। इसके बाद धीरे-धीरे जब सारी स्थिति से अवगत कराया गया तो मैं कुछ समझ सका हूँ। यही कारण है कि मैं-"गुरु गोविंद दोनों खड़े, किसके लागू पांव। बलिहारी गुरुदेव की गोविन्द दियो मिलाय" वाली बात पर अधिक भरोसा करता हूँ।

  • यह संसार एक ही परम सत्ता का विचित्र रूप है। ऐसे विशाल स्वरूप में उस परम सत्ता से साक्षात्कार कराने में केवल संत सद्‌गुरु ही सक्षम हैं। गुरु कृपा बिना यह कार्य पूर्ण रूप से असम्भव है। 'गुरु', ईश्वर का ही सात्विक स्वरूप हैं। ठेट अगम से आई हुई आत्मा ही गुरु पद पर पहुँच पाती है। इस प्रकार के चेतन गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होते ही जीवन में आनन्द की लहरें दौड़ने लगती हैं। तत्काल सत्लोक की विभिन्न सात्विक शक्तियों की प्रत्यक्षानुभूतियाँ होने लगती है। जीव माया की परिधि को अनायास गुरु-कृपा से लांघ जाता है। इसके बाद क्रमिक विकास के साथ अगम की तरफ बढ़ता हुआ, जीव एक ही जन्म में उस परम सत्ता में लीन हो जाता है। इस प्रकार गुरु कृपा से जीव एक ही जन्म में जन्म-मरण के चक्कर से छूट कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

  • मैं पहले ही कह चुका हूँ कि सात्विकता और तामसिकता दो विपरीत शक्तियाँ हैं। दोनों एक स्थान पर नहीं रह सकतीं। मोटे रूप से रात और दिन के उदाहरण से समझा जा सकता है। सूर्य भगवान् के उदय होते ही अन्धेरा भाग जाता है, इस प्रकार संत सत्गुरु के चरणों में समर्पित होते ही अन्धकार भाग जाता है।

    - समर्थ सद्‌गुरुदेव श्री रामलाल जी सियाग

  • मेरे अनुभवों से मालुम हुआ कि गुरु के चरणों में बैठ कर सभी तामसिक वृत्तियों के अंगीकार के साथ-साथ उनको त्यागने की प्रार्थना अनिवार्य है। जीव स्वयं उस स्थिति में नहीं होता कि वह अकेला अंगीकार और उनका त्याग करने में सक्षम हो। तामसिक वृतियों ने जीव को ऐसा माया जाल में फंसा रखा है कि वह उनके वशीभूत हो कर, जो कुछ भी कर रहा है, उसे न्याय संगत और ठीक समझता है।

  • गुरु के सानिध्य में जाते ही तामसिक भावनाएँ पूर्ण रूप से दूर भाग जाती हैं, परन्तु इसके लिए पूर्ण समर्पण अनिवार्य है। समर्पण के बिना कुछ भी नहीं मिल सकता। ज्यों ही गुरु के प्रति समर्पित हुआ कि तामसिक सत्ता के बंधन खुल जाते हैं। जीव जो कुछ कर रहा है, उसके भले बुरे का तत्काल ज्ञान हो जाता है। ऐसी स्थिति में पूर्ण अंगीकार सरल और सम्भव हो जाता है। परन्तु केवल अंगीकार से काम नहीं बन सकता। तामसिक शक्तियाँ बहुत प्रबल होती हैं, वे फिर कभी दबोच सकती हैं। अतः अंगीकार के साथ उन भावों के त्याग की भी प्रार्थना गुरु के सामने करनी आवश्यक है। गुरु परम दयालु होते हैं। इस प्रकार अंगीकार और त्याग की प्रार्थना तत्काल स्वीकार कर लेते हैं। इधर गुरु ने करूणा करके जीव की प्रार्थना स्वीकार की, उधर उसकी काया में तामसिकता का स्थान सात्विकता ले लेती है। इस प्रकार क्षण भर में गुरु कृपा से तामसिकता से सहज ही हमेशा-हमेशा के लिए जीव को छुटकारा मिल जाता है।

  • लोग जिस कार्य को कई जन्मों में होना असम्भव बताते हैं, गुरुकृपा से वह परिवर्तन क्षणभर में हो जाता है। मैंने इस प्रकार के परिवर्तन प्रत्यक्ष होते देखे हैं। मुझे परम सत्ता ने स्पष्ट बताया कि जिस प्रकार चावल की हांडी में से एक चावल का दाना लेकर देखने से सभी चावलों के पकने का ज्ञान हो जाता है, उसी प्रकार सभी समर्पित लोगों के अंगीकार और न्याय की प्रार्थना का, एक जैसा प्रभाव होता है।

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