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मोक्ष क्या है? उसको प्राप्त करना क्यों जरूरी है?
फरवरी 14, 1988
गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग
एवीएसके, जोधपुर के संस्थापक और संरक्षक

हम देख रहे हैं कि संसार की हर वस्तु नाशवान है। हमारे सभी संत कह गये हैं- वह अजर अमर है। उसकी प्राप्ति के बिना परम शान्ति असम्भव है। केवल ईश्वर प्राप्ति से ही परम शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति सम्भव है, इसके बिना जीव के बन्धन कटने का कोई उपाय नहीं है। हमारे सभी संत कह गये हैं, मनुष्य जीवन ही मात्र मोक्ष प्राप्त करने का समय है। अगर जीवन कर्मों की गहन गति के कारण, मनुष्य जन्म पाकर भी अपने उस सही गन्तव्य की तरफ यात्रा प्रारम्भ नहीं करता है तो इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात कोई और हो ही नहीं सकती। इस संसार के बारे में संतों ने स्पष्ट कहा है कि यह मात्र ईश्वर का ही विश्व स्वरूप है। मनुष्य योनि, ईश्वर की उच्चत्तम स्थिति का ही नाम है। इसी लिए हमें संतों ने स्पष्ट कहा है कि पूर्ण ब्रह्माण्ड सहित सभी लोक, मनुष्य शरीर के अन्दर हैं। मनुष्य शरीर ही असली मन्दिर है, जिसमें प्रवेश करने पर ही ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है। उस परम सत्ता तक पहुँचने का यही एक मात्र रास्ता है। इसके बिना उस परमसत्ता से जुड़ने का कोई उपाय नहीं है।

  • इस समय संसार में जितनी भी आराधनाएँ प्रचलित हैं, प्रायः सभी का तरीका बहिर्मुखी है। कुछ चन्द अन्तर्मुखी होने की बात बताते हैं, परन्तु वह सब माया के क्षेत्र में प्रवेश करने मात्र का उपाय है। कुछ लोग स्वास की क्रिया विशेष के द्वारा उस परम सत्ता से जुड़ने की बात तो करते हैं, परन्तु किसी को भी उसका पूर्ण ज्ञान नहीं है। यह आराधना इस युग की न होने के कारण, अब होनी असम्भव है। पातंजलि आदि हमारे कई ऋषियों ने इसके लिए यम, नियम, खान-पान तथा रहन सहन के जो सिद्धान्त बताये हैं, उनका पालन इस युग में तो पूर्ण रूप से असम्भव है। अगर करोड़ों में एक मनुष्य कुछ आंशिक सफलता भी पा लेता है तो उससे क्या लाभ?

  • इस क्षेत्र की कमाई मात्र उसी के काम आती है, जो कमाता है। इसके अलावा ईश्वर ने स्त्रियों की प्रकृति ही ऐसी बनाई है कि उनके लिए तो यह आराधना संभव ही नहीं है। क्या स्त्रियों को मोक्ष का अधिकार नहीं है? ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों को इस संसार में जीवन यापन करते हुए मोक्ष प्राप्ति का एक बराबर अधिकार है। इस प्रकार पिछले युगों की आराधनाएँ, इस युग में सम्भव नहीं हैं। कालचक्र अबाध गति से चलता रहता है। अतः संसार की हर वस्तु में परिवर्तन अवश्यसंभावी है। इसे रोकने की किसी में भी क्षमता नहीं है।हम देख रहे हैं, भौतिक जगत् में विज्ञान ने कितनी तरक्की कर ली है। यह बात यथार्थ और सही है। परन्तु अभी तक आध्यात्मिक जगत् में, इस सम्बन्ध में बिलकुल चेतना नहीं आई है। एक निर्जीव पदार्थ की तरह यह जगत् पूर्ण रूप में अचेतन अवस्था में पड़ा है।

  • विज्ञान के सभी सिद्धान्त प्रयोगशालाओं में कई बार सही प्रमाणित होने के बाद लिपिबद्ध किये जाते हैं। फिर भी उन पुस्तकों को पढ़ कर कोई भी विद्यार्थी, डॉक्टर या इंजिनीयर नहीं बन सकता, जब तक वह उन सिद्धान्तों को प्रयोगशाला में स्वयं सिद्ध करके नहीं देख लेता। इस प्रकार विज्ञान के विद्यार्थियों को अगर प्रयोगशाला का मुँह ही नहीं देखने दिया जाए और केवल इस ज्ञान की पुस्तकें पढ़ाकर डॉक्टर और इंजिनियर बनाने के प्रयास किये जायें तो पूर्ण रूप से असफलता ही हाथ लगेगी। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर प्रयोगशालाएँ प्रगति करती रही हैं और नई-नई खोज, शोध कार्यों द्वारा होती गईं और नई खोज के सिद्धान्तों को लिपिबद्ध किया जाता रहा। यही कारण है कि भौतिक विज्ञान आज अपनी चरम सीमा तक पहुँचने वाला है।

इसके ठीक विपरीत अध्यात्म विज्ञान की प्रायः सारी की सारी प्रयोगशालाएँ, समय और कालचक्र के साथ समन्वय नहीं रख पाने के कारण पूर्ण रूप से नष्ट हो गईं। इस समय संसार के सभी धर्माचार्यों के पास पुराने आध्यात्मिक विज्ञान के वैज्ञानिकों की पुस्तकें मात्र बची हुईं हैं। प्रयोग शालाओं के अभाव में ये सभी ग्रन्थ निरर्थक हैं। केवल सैद्धान्तिक ग्रन्थ इस ज्ञान को सजीव बनाकर मानव का कल्याण करने में समर्थ हो ही नहीं सकते। अतः जब तक प्रयोगों के द्वारा शोध करके इस विज्ञान को बढ़ावा नहीं दिया जायेगा, तब तक तोते की तरह ग्रन्थों को रटने से कुछ भी लाभ नहीं होगा क्योंकि सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान का खजाना, मनुष्य शरीर के अन्दर ही छिपा है।
  • आज तक की भौतिक विज्ञान की उन्नति का कारण मनुष्य के अन्तर की प्रेरणा और चेष्टाओं का ही फल है। अतः अध्यात्म विज्ञान की खोज भी मनुष्य को अन्तर्मुखी हो कर ही करनी पड़ेगी। भौतिक विज्ञान तो मनुष्य को भौतिक सुख ही प्रदान कर सकता है। ये सुख अस्थाई और क्षणिक होते हैं। इन से स्थाई सुख शान्ति सम्भव नहीं है। अतः जब तक भौतिक विज्ञान के बराबर अध्यात्म विज्ञान उन्नति नहीं कर लेता, तब तक महर्षि अरविन्द की, "धरा पर स्वर्ग उतर आने" की भविष्यवाणी सत्य नहीं हो सकेगी।

  • भौतिक विज्ञान बहिर्मुखी चेतना का परिणाम है, इसके ठीक विपरीत आध्यात्मिक शक्तियों का साक्षात्कार अन्तर्मुखी आराधना के द्वारा ही सम्भव है। भौतिक विज्ञान इन्हीं आध्यात्मिक शक्तियों की देन है। अतः जब तक यह शक्ति अपनी पैदा की हुई वैज्ञानिक शक्ति को सीधा अपने अधीन करके इसका संचालन करना प्रारम्भ नहीं करती है तब तक, श्री अरविन्द की भविष्यवाणी सत्य नहीं होगी। भौतिक विज्ञान की इस विनाश लीला पर तो अंकुश लगाने में सिर्फ आध्यात्मिक शक्ति ही सक्षम है, और सभी उपाय पूर्ण रूप से निरर्थक हैं। मानव अपनी बुद्धि के कौशल से इस विनाश लीला को रोक पाने में असमर्थ है।

  • इस युग के धर्मगुरु जो कृत्रिम शान्ति मिशन चला रहे हैं, उससे कुछ भी असर होने वाला नहीं है। भौतिक विज्ञान एक सच्चाई है। यह किसी झूठ का आदेश कभी नहीं मानेगा। जब तक इसका जन्मदाता स्वयं प्रकट हो कर प्रमाण सहित इस शक्ति को सन्तुष्ट नहीं करेगा, यह किसी का आदेश नहीं मानेगी। अतः जब तक संसार का मानव अन्तर्मुखी होकर उस परमसत्ता के धाम को जाने वाले रास्ते से चलकर उसका साक्षात्कार नहीं कर ले, शान्ति सम्भव नहीं। इस प्रकार ज्यों ही संसार का मानव उस परम सत्ता से जुड़ा कि ये भौतिक शक्तियाँ, मानव के सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाऐंगी, और चेरी बनकर प्राणी मात्र की सेवा में लग जाऐंगी।

भारत जगत् हृदय का रखवाला है। अतः इस भूभाग पर पैदा होने वाले मनुष्य के माध्यम से ही वह परम शक्ति अपनी सत्ता का बोध सारे संसार को कराकर शान्ति स्थापित करेगी। हमारे संतों ने उसके ध्येय तक पहुँचने के रास्ते का स्पष्ट वर्णन किया है। संन्यास मार्ग और भक्ति मार्ग द्वारा पहुँचना सम्भव है। गीता में स्पष्ट लिखा है, संन्यास मार्ग का रास्ता बहुत कठिन है, परन्तु निष्काम कर्म योग के सिद्धान्त पर चल कर भक्ति करता हुआ, प्रेम मार्गी जीव निश्चित रूप से निर्विघ्न उस परमसत्ता से जुड़ जाता है। हमारे शरीर में छह चक्रों का वर्णन आता है। योगी मूलाधार से चलना प्रारम्भ करता है। इस प्रकार छठा चक्र भेदने पर वह माया के क्षेत्र को पार कर सकता है। इस चक्र को आज्ञाचक्र भी कहते हैं क्योंकि नीचे के माया के जगत् की सारी शक्तियाँ आज्ञाचक्र के ऊपर की शक्ति के आदेश से कार्य करती हैं, इसीलिए इसे आज्ञाचक्र कहा गया है छठे चक्र तक की सभी मायावी शक्तियाँ इतनी प्रबल है कि कोई भी अपनी सीमा से बाहर, जीव को निकलने ही नहीं देती। अतः इस मार्ग से पहुँचना, इस युग में कठिन ही नहीं, असम्भव सा लगता है।
  • परन्तु निष्काम कर्म योग के सिद्धान्त पर चलकर जीव प्रेम पूर्वक ईश्वर भक्ति करता हुआ निर्विघ्न आसानी से अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है। अतः गीता में इसी मार्ग को श्रेष्ठ बताते हुए, इसी पर चलने का निर्देश दिया गया है। इस युग के धर्म गुरुओं ने ज्ञान के अभाव में, इस पथ पर चलने की व्याख्या करते हुए, ऐसी उलझनें पैदा कर दी कि प्राणि, विभिन्न भ्रान्तियों में उलझ कर रह जाता है। पाप, पुण्य, दान, त्याग, तपस्या, धर्म आदि की ऐसी गलत व्याख्याएँ कर डालीं कि जीव भ्रमजाल में फंस कर रह जाता है। कर्मकाण्ड, प्रदर्शन, शब्द जाल, तर्कशास्त्र और अन्धविश्वास के सहारे अध्यात्म का ऐसा रूप दिखाया जाता है कि सही रास्ता उसे दिखाई ही नहीं देता। यही कारण है कि इतना आसान काम ही असम्भव बन गया और इस प्रकार लोगों का धर्म पर से विश्वास ही खत्म हो गया। परिणाम के अभाव में हर कार्य की यही स्थिति होती है। निरर्थक कार्य कोई क्यों करेगा? अतः आज संसार में धर्म के प्रति लोगों की आस्था समाप्त होने का दोष, इस युग के धर्म के धर्म गुरुओं का है।धर्म को उन्होंने पेट से जोड़ लिया।

  • इस प्रकार धर्म की आड़ में जब शोषण, अन्याय और अत्याचार अपनी सीमा लांघ गया तो लोगों ने विद्रोह कर दिया। धर्म की इस हालत को देख कर भंयकर दुःख होता है। इतना होने पर भी धर्मगरुओं को दया नहीं आ रही है। आज भी नये नये हथकण्डे अपना कर लूट में लगे हुए हैं। अगर सच्चा आध्यात्मिक गुरु मिल जाए तो क्षण भर में अन्धकार भाग जाता है। सच्चे गुरु की व्याख्या, मैं पहले कर ही चुका हूँ। क्योंकि संत सत्गुरु की माया, अतीत सत्ता से सीधा सम्पर्क रखती है, इस लिए संसार की माया उनके सामने चेरी बनकर, हाथ जोड़े खड़ी रहती है। इस प्रकार ऐसे गुरु से जुड़ने वाला जीव अनायास ही माया के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

  • इस प्रकार गुरु कृपा से वह सीधा आज्ञाचक्र भेदकर, अपनी यात्रा प्रारम्भ करता है क्योंकि गुरुकृपा से अनायास ही जीव माया के चक्र से मुक्त होकर, उस परम सत्ता की आकर्षण सीमा में प्रवेश कर जाता है। इस प्रकार आगे के मार्ग में केवल सहयोगी शक्तियाँ ही उसे मिलती रहती हैं। इस प्रकार ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है, आकर्षण बढ़ता जाता है और चलने की गति तेज होती जाती है। इन आध्यात्मिक लोकों में समय की दूरी जीव को प्रभावित नहीं कर सकती। अतः उस परम सत्ता से जुड़ने में उसे कोई देर नहीं लगती। विघ्न बाधाएँ तो आज्ञाचक्र तक ही होती हैं। इस प्रकार संत सत्गुरु से जुड़ते ही वे सभी अनायास ही समाप्त हो जाती हैं। इस प्रकार जीव उस परमसत्ता से जुड़ कर जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पा जाता है।

  • आज्ञाचक्र से ऊपर मोटे तौर पर तीन लोक हैं। सत् लोक, अलखा लोक और अगम लोक।अगम लोक में पहुँच कर जीव उस परमसत्ता में लीन हो जाता है। यहाँ परमानन्द और चिरस्थाई शांति रहती है। त्रिगुणमयी माया द्वारा रचा गया जगत् ही दिखाई देता है क्योंकि संसार के जीव इस माया द्वारा संचालित हैं, अतः उसे भी देखने में सक्षम नहीं हैं । केवल अन्तर दृष्टि ही उन्हें देखने में सक्षम है। ज्यों-ज्यों जीव ऊपर चढ़ता जाता है, नीचे के लोक और उसकी शक्तियाँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। मनुष्य का शरीर तीन भागों में विभक्त है- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, और कारण शरीर। कारण शरीर में इस जीवन के प्रारम्भ से अन्त तक का पूरा हिसाब होता है। मनुष्य अपने जीवन की आगे होने वाली घटना का ज्ञान, इस शरीर में प्रवेश करने पर टेलीविजन के दृश्य की तरह जान जाता है। ये तीनों शरीर त्रिगुणमयी माया की हद में हैं। उनके अन्दर होती है आत्मा। परमात्मा, करोड़ों सूर्य से भी तेज शक्ति का पुँज है। उसकी एक किरण का नाम आत्मा है। क्योंकि यह उस पूर्ण सत्ता का ही अंश है अतः आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं होता। इससे जीव का जब साक्षात्कार हो जाता है तो इसी धार के सहारे जीव उसके उद्गम स्थान यानी परमात्मा तक पहुँच जाता है। माया के क्षेत्र में इससे साक्षात्कार सम्भव नहीं है। अतः आज्ञा चक्र का भेदन किये बिना यह कार्य असम्भव है, स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तथा आत्मा और परमात्मा इस प्रकार से लिप्त हैं कि इनको अलग-अलग करके देखाना असम्भव है।

  • उदाहरण के तौर पर एक गन्ने के ऊपर अन्दर दो हिस्से होते हैं। अन्दर के भाग में रस छिपा रहता है। देखने से केवल ऊपर का शख्त भाग ही दिखाई देता है। इस प्रकार दबाने से उसमें से रस निकलता है। रस को देख कर हम उसका स्वाद नहीं जान सकते। वह तो चखने पर ही मालूम होता है कि वह मीठा है। उस रस में जो मीठापन है उसको पैदा करने वाली सत्ता ही ईश्वर है। इस प्रकार रस तक के तीन रूप शरीर के रूपों की तरह है। इस के अन्दर जो मीठापन है वह आत्मा और जिस सत्ता के कारण यह मीठापन पैदा हुआ वह परमात्मा है। गन्ने को देखने से हमें उसमें निहित इन सभी वस्तुओं का ज्ञान नहीं हो सकता।

यह उदाहरण मात्र मोटे तौर पर समझाने का प्रयास मात्र है। असलियत तो प्रत्यक्षानुभूति और साक्षात्कार का विषय है। उसका ज्ञान तो आध्यात्मिक ज्ञान की प्रयोगशाला में परीक्षण करने पर ही प्राप्त हो सकता है। जब संसार में धर्म का लोप हो जाता है और अधर्म का बोलबाला हो कर, तमस ठोस बन कर संसार में जम जाता है, उस समय जिस जीव के माध्यम से परम सत्ता अपना सात्त्विक प्रकाश फैलाती है, वही सच्चा गुरु होता है। एक ही सच्चा संत सत्गुरु सम्पूर्ण संसार का अन्धकार भगाने में सक्षम होता है। इससे समझा जा सकता है कि गुरु क्या होता है? इसीलिए हिन्दू धर्म के सभी ग्रन्थों में गुरु की महिमा को वर्णन से परे बताया है। भौतिक सुख क्षणिक और भरमाने वाले माया के खेल हैं। बचपन में जिससे सुख महसूस होता है- तरुण अवस्था आते ही सुख के कारण और हो जाते हैं और ज्यों ही जवानी आती है और ही चीजों से सुख की अनुभूति होती है। बुढ़ापे में स्थिति फिर बदल जाती है। अन्त काल में जीव को भारी पश्चाताप होता है कि मैंने इन झूठे सुखों के चक्कर में मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया। श्री राजगोपालाचार्य ने अपने अन्तिम समय में इन सुखों की जो व्याख्या की है वह पूर्ण साफ है।
  • सच्चा सुख चिर स्थाई एक जैसा ही रहता है। वह सुख केवल परम सत्ता से जुड़ने पर ही मिल सकता है। अतः मनुष्य को सच्चाई की खोज में प्रयत्नशील रहना चाहिए। परमात्मा हर समय, झुककर उसका हाथ थामने को तैयार रहता है। ऐसी स्थिति में पहुँचने पर थोड़े से प्रयास से ही भवसागर को पार करके, उस परम सत्ता में लीन हुआ जा सकता है। इस प्रकार मिलने वाला परम सुख और परम शान्ति चिर स्थाई होती है। एक बार मिल जाए तो अनन्तकाल तक जीव ऐसी स्थिति में रहता है और जन्म मरण के चक्कर से छूट जाता है। ऐसी स्थिति का ही नाम मोक्ष है।

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