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युग के गुण-धर्म से संसार के सभी प्राणी प्रभावित होते हैं
7 अक्टूबर 1988
गुरुदेव श्री रामलालजी सियाग
एवीएसके, जोधपुर के संस्थापक और संरक्षक

विष्णु पुराण स्पष्ट कहता है कि कलियुग में ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व तथा वैश्यत्व का पूर्ण रूप से पतन हो जाता है। एक मात्र शूद्रत्व का साम्राज्य रह जाता है। यह तत्त्व अपने गुण-धर्म से संसार के सभी जीवों का संचालन कर रहा है। यही कारण है संसार में पूर्ण रूप से तामसिक सत्ता का साम्राज्य है। ईश्वर के नाम की आड़ में सभी लोग तामसिक शक्तियों का उपयोग कर रहे हैं।

  • आम व्यक्ति भी इसी युग के गुणधर्म से प्रभावित होने के कारण कुछ भी नहीं समझ पा रहा है। ऐसे धर्मगुरुओं की संसार के सभी धर्मों में बाढ़ सी आ गई है।

  • इस सम्बन्ध में समर्थ गुरु रामदास जी महाराज ने बहुत ही स्पष्ट व्याख्या की है -

  • तिन्ही लोक जेथुन निर्माण जाले। तया देवरायासि कोणी न बोले ।
    जगीं थोरला देव तो चोरलासे। गुरुवीण तो सर्वथाही न दीसे ॥

    "तीनों लोक - भूलोक, धुलोक, पाताल लोक जहाँ से उत्पन्न हुए, उस सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म देवाधिदेव श्रीराम को कोई नहीं कहता। जग में, सर्वोत्तम देवता चुराया गया है। उसके चोरी चले जाने के पश्चात वह दिखाई नहीं दे रहा है। उस सर्वदेवाधिदेव की चोरी की तो गयी है, किन्तु सद्गुरु रूपी गुप्तचर की सहायता के बिना, वह नहीं दिख सकेगा।"

  • अब समर्थ सद्गुरुदेव, सद्गुरु की परीक्षा कैसे करनी चाहिए, यह समझाते हैं -

  • गुरु पाहतां पाहतां लक्ष कोटी। बहुसाल मंत्रावली शक्ति मोठी ।
    मनीं कामना चेटकें धातमाता। जनीं व्यर्थ रे तो नव्हे मुक्तिदाता ॥

    "गुरुओं को देखते-देखते लाखों करोड़ों, गुरु मिलेंगे। वे बहुत वर्षों तक मंत्र द्वारा चतुराई से अपने भीतर जादूगरी की बड़ी शक्ति द्वारा कामना पूर्ति कर लोगों को अपने चंगुल में चिन्तामणि सदृश अपनी मंत्र शक्ति के प्रभाव से ही फँसाते फिरते हैं। ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं।वे मोक्ष दाता-सद्गुरु-पद पाने के अधिकारी नहीं होते।"

  • नव्हे चेटकी चालकू द्रव्यभोंदू। नव्हे निंदकू मत्सरू भक्तिमंदू ।
    नव्हे उन्मतू वेसनी संगबाधु। जगी ज्ञानिया तोचि साधू अगाधू ॥

    "जो जादू करने वाला होता है, लोगों के सम्मुख दीनता दिखाकर आह्लाद उत्पन्न करने वाला या मिथ्या प्रशंसा करने वाला होता है तथा अपने साधुत्व का प्रदर्शन कर लोगों से पैसा लूटने वाला द्रव्य लोभी होता है, वह सद्गुरु-पद का अधिकारी नहीं होता। वह किसी की निन्दा नहीं करता, किसी से मत्सर्य नहीं रखता, उन्मत्त नहीं होता, व्यसनी नहीं होता तथा बुरी संगति में नहीं रहता। जो बुरी संगति में बाधा डालनेवाला ज्ञान सम्पन्न होता है, वही अगाध ज्ञानी व्यक्ति साधु है, ऐसा जानना चाहिए।"

  • नव्हे वाउगी चाहुटी काम पोटीं ।
    क्रियेवीण वाचालता तेचि मोठी ॥

    मुखें बोलिल्यासारिखें चालताहे ।
    मना सद्गुरु तोचि शोधूनि पाहे ॥

    "वह व्यक्ति चुगलखोर नहीं होता। उसके अन्तरंग में काम भावना नहीं होती। उसमें क्रिया के बिना वाचालता नहीं होती । वह मुख से बोले गये शब्दों का वैसा ही आचरण करने में समर्थ होता है। हे मन! इन लक्षणों से युक्त व्यक्ति को ही सद्गुरु समझना चाहिए ।"

  • जनीं भक्त ज्ञानी विवेकी विरागी ।
    कृपालू मनस्वी क्षमावंत योगी ॥

    प्रभू दक्ष व्युत्पन्न चातुर्य जाणे ।
    तयाचेनी योगे समाधान बाणे ॥

    "वह सद्गुरु पद का अधिकारी भक्त होता है और विवेक-वैराग्य सम्पन्न, कृपालु, मनस्वी, क्षमाशील, योगी, समर्थ, अत्यन्त सावधान, व्युत्पन्न (प्रत्युत्पन्नमतिवाला), चातुर्य सम्पन्न तथा संगति करने पर समाधान की प्राप्ति कराकर समाधानी बनाने वाला होता है।"

  • नव्हे तेंचि जालें नसे तेंचि आलें ।
    कलों लागलें सज्जनाचेनि बोलें ॥

    अनिर्वाच्य तें वाच्य वाचें वदावें ।
    मना संत आनंत शोधीत जावें ॥

    "जो पहले नहीं था, वह हो गया, जो नहीं आता था, वह आ गया। सज्जन की वाणी के कारण आकलन होने लगा। जो अनिर्वाच्य था, वह वाच्य हो गया। उसे वाणी से बोलना चाहिए। संत-संगति से अनन्त ब्रह्म की खोज करनी चाहिए। "

इसी प्रकार संत सद्गुरु की महिमा में मीराबाई तो यहाँ तक कह गईं
गुरु-गोविन्द दोनों खड़े, किसके लागुं पाँव ।
बलिहारी गुरुदेव की, गोविन्द दियों मिलाय ॥

- मीराबाई

संत कबीर ने भी इस सम्बन्ध में कहा है
कबीरा "धारा" अगम की, सद्गुरु दयी लखाय ।
उलट ताहि पढ़िये सदा, स्वामी संग लगाय ॥

- संत कबीर

  • उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि इस समय संसार में कैसे धर्म गुरु प्रकट हो रखे हैं, यही कारण है कि इस समय संसार में भारी अन्धकार व्याप्त है। क्योंकि इस समय कोई भी आराधना प्रत्यक्ष परिणाम नहीं दे रही है, अतः लोगों का विश्वास ही खत्म नहीं हुआ, लोगों ने धर्मगुरुओं के विरुद्ध विद्रोह तक कर दिया है। ऐसी भयंकर स्थिति जब भी संसार में हुई है, तब उस परम सत्ता का अवतरण संसार में हुआ है।

  • इस सम्बन्ध में महर्षि श्री अरविन्द ने भी कहा है "संसार में मानव चेतना में अतिमानस चेतना का आगमन अवश्यम्भावी है।" संसार के सभी संतों की भविष्यवाणियों के अनुसार युग परिवर्तन का समय अब दूर नहीं है। भौतिक सत्ता के परिवर्तन में भी खून खराबा होता है, यह तो अन्धकार पर प्रकाश की विजय का समय है।

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