दिव्य आशीर्वाद (आनंद)

Sketch छंद और उनके अर्थ
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यह एक आन्तरिक आनन्द है, जो सभी सच्चे विश्वासियों के हृदय में आता है। यह आनन्द हृदय में बना रहता है, सांसारिक आनन्द के समान यह आता जाता नहीं है। उसका (प्रभु का ) आनन्द पूर्ण है, वह हमारे हृदयों के कटोरों को आनन्द से तब तक भरता है, जब तक उमड़ न जाय। प्रभु का आनन्द जो हमारे हृदयों में बहता है, हमारे हृदयों से उमड़कर दूसरों तक बह सकता है ।

Bible

— बाइबल में आनन्द के विषय में इस प्रकार लिखा है

भगवान कृष्ण ने भगवत गीता में इस दिव्य आनन्द की बारीकी से इस प्रकार व्याख्या की है:—

  • “बाहर के विष्यों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला पुरूष अन्तःकरण में जो भगवत ध्यान जनित आनन्द है उसको प्राप्त होता है (और) वह पुरूष सच्चिदानन्दधन परब्रह्म परमात्मारूप योग में एकीभाव से स्थित हुआ अक्षय आनन्द को अनुभव करता है”। (भ.गी. ५:२१)

  • “इस प्रकार आत्मा को निरन्तर (परमेश्वर के स्वरूप में) लगाता हुआ स्वाधीन मनवाला योगी मेरे में स्थित रूप परमानन्द पराकाष्ठा वाली शान्ति को प्राप्त होता है”। (भ.गी. ६:१५)

  • “इन्दि्रयों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा, ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ यह योगी भगवत स्वरूप से चलायमान नहीं होता है”। (भ.गी. ६:२१)

  • “क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शान्त है (और) जो पाप से रहित है (और) जिसका रजोगुण शान्त हो गया है ऐसे इस सच्चिदानन्दधन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को अति उत्तम आनन्द प्राप्त होता है”। (भ.गी. ६:२७)

  • “पाप रहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को (परमात्मा में) लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति रूप अनन्त आनन्द को अनुभव करता है”।(भ.गी. ६:२८)

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