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प्रदीप सिंह

14 वर्षों की तड़प के बाद समर्थ सदगुरुदेव की प्राप्ति

पता

प्रदीप सिंह उम्र-40 वर्ष प्रेमनगर, बरनाला(पंजाब)-148101

मैं प्रदीप सिंह भारतीय सेना में कार्यरत हूँ। एक समय था, जब ना तो मुझे धर्म के बारे में ज्ञान था, ना गुरु के बारे में। मुझे नहीं पता था कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? मेरा जीवन भी एक आम इन्सान की तरह चल रहा था। मुझ में पता नहीं कितने अवगुण थे, शायद मैं बता भी नहीं सकता।

  • बात "2003" की है, तब मेरी गुरु के प्रति आस्था जागी । जम्मू कश्मीर के तंगधार में, मैं पोस्टेड था, ड्यूटी पर मेरे साथ एक सत्संगी भाई था, वह हमेशा गुरु के बारे में बातें करता रहता था, और बातों-बातों में वह इतना भावुक हो जाता था कि उसकी आँखों से आंसू बहने लगते थे। मुझे बहुत हैरानी होती कि गुरु के प्रति इतना प्यार क्यों? धीरे-धीरे उसकी बातें समझ में आई, कि जीवन में गुरु की जरूरत क्यों है, समझ आ गया कि इस जीवन का लक्ष्य क्या है, और वह लक्ष्य बिना गुरु के पूरा नहीं हो सकता।

  • मैंने गुरु की तलाश की, गुरु मिला उनसे नाम दान (दीक्षा) प्राप्त किया और भक्ति शुरू कर दी। मैं भक्ति करता रहा लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला । जब भी सत्संग में जाते तो वहाँ एक ही बात बताई जाती कि गुरु में कोई कमी नहीं होती, शिष्य में ही कोई कमी होगी, जो उसकी साधना सफल नहीं हो पा रही। इस वजह से मैं हमेशा खुद में ही कमियाँ ढूँढ़ता रहता और उन्हें दूर करने की कोशिश करता रहता था।

मुझ में भक्ति की तीव्र इच्छा थी। मैं जल्दी से जल्दी भगवान् की प्राप्ति कर लेना चाहता था। रात को उठ-उठ कर, मैं ध्यान और जाप किया करता था। मैं जल्दी से जल्दी इस जीवन को सफल कर देना चाहता था। एक बार क्या हुआ कि जप और ध्यान बहुत ज्यादा करने की वजह से, मेरा ध्यान इतना एकाग्र हो गया कि जैसे ही मैं सोने के लिए अपने बिस्तर पर जाता और जैसे ही सोने लगता तो अचानक ही मेरा पूरा शरीर प्रकाश से भर जाता।
  • मुझे समझ नहीं आता था कि मैं प्रकाश में हूँ या प्रकाश मुझ में है। मुझे प्रकाश के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता था। "अनहद नाद" भी मुझे सुनाई देने लगा। यह इतना तीव्र होता था कि मुझसे सहन करना भी मुश्किल हो जाता था और मैं डरने लगा था, ऐसी भक्ति से। (यह पूरी घटना महज मेरी एकाग्रता की वजह से घटी थी।) धीरे-धीरे यह सब बंद हो गया और जीवन फिर सामान्य तरीके से चलने लगा।

  • मैं 14 वर्ष ध्यान और भक्ति करता रहा, लेकिन कोई किनारा नहीं मिला। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मुझमें कमी किस बात की है? मैं हमेशा ही चिंता में रहने लगा था कि शायद यह जीवन ऐसे ही चला जाएगा। धीरे-धीरे मेरी उस गुरु के प्रति आस्था भी कम होती गई।

  • (गुरुदेव सियाग से दीक्षा प्राप्ति)- बात मई 2017 की है। मैं सेना के अस्पताल, अश्विनी में अपने किसी ईलाज के लिए भर्ती था, गुरुदेव सियाग के एक शिष्य वहाँ ध्यान करने की विधि बताकर ध्यान करवाते थे। मैंने मन में सोचा कि जीवन के 14 वर्ष गुजर गये- ध्यान कर कर के ऊब गया, कुछ होता तो है नहीं, अब काहे का ध्यान? फिर भी मन में सोचा कि अभी अपने पास समय तो पड़ा ही है, ध्यान करने में कुछ बुराई तो है नहीं। मैंने भी गुरु जी का चित्र देखकर ध्यान किया। मुझे नहीं पता कब ध्यान लगा और मैं गहराई में चला गया। मेरा रोम-रोम खिल उठा। असीम शांति का एहसास हुआ। मन इतने वर्षों से तड़प रहा था, आज निर्मल और शांत हो गया। मुझे इन 10 से 15 मिनट में ज्ञान हो गया कि यही मेरे सच्चे सत्गुरु है। मेरी सभी शंकाएँ दूर हो गई। 14 वर्ष बाद एक सच्चे गुरु की प्राप्ति हो पाई, आज मेरा जीवन सफल है।

  • मुझे किसी प्रकार की चिंता नहीं है। अपने आपको मैंने गुरु को सुपुर्द कर दिया है। सत्गुरु जी मेरी हर मनोकामना को पूरा करते हैं। सच बात तो यह है कि सिद्ध गुरु हमेशा अपने शिष्य के पास और साथ होता है। शिष्य कहीं भी हो, सही समय आने पर गुरु, अपने आप उसे अपने पास बुला लेता है। जब पूर्ण सदगुरु मिल जाये तो कोई चिंता नहीं।

  • जब कोई भक्ति करे और परिणाम न मिले तो क्या फायदा? जो परिणाम मिले, इसी जन्म में मिले। मेरी पसली में काफी दर्द था। एक दिन प्रार्थना की कि मेरा यह दर्द ठीक हो जाये और ध्यान के दौरान उसी पॉइंट पर पिंच हुआ और दर्द ठीक हो गया। पहले कुछ नहीं होता था, लेकिन उस दिन पहली बार लगा कि कोई शक्ति है। शरीर में झटके लगे, शरीर पसीना-पसीना हो गया, अन्दर से टन-टन की आवाज आई।

  • सदगुरुदेव भगवान् के पावन मिलन के बाद मेरा रोम रोम खिल गया। इतनी तड़प के बाद जब मुझे सदगुरुदेव की प्राप्ति हुई तो मुझे समझ में आ रहा है कि इस "गुरु तत्त्व" का मूल्य क्या है? "भरसक प्रयास किया तब तक कुछ नहीं मिला और जब मिलने का समय आया तो सहज में इतना दे दिया कि मैं कल्पना नहीं कर सकता।" मेरी तो जगत् को एक ही राय है कि जिनको 'सदगुरुदेव भगवान मिल गये हैं, अपने भीतर की गइराई में उतरते जाएं। सदगुरुदेव भगवान् को बारंबार प्रणाम करता हूँ।

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